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सीजेपी की सुनवाई में केंद्र ने महिला पुलिसकर्मी के यौन उत्पीड़न का मामला उठाया

नई दिल्ली:

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कॉकरोच जनता पार्टी के नियोजित विरोध प्रदर्शन पर दिल्ली पुलिस द्वारा की गई अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, केंद्र ने शुक्रवार को राष्ट्रीय राजधानी में हाल के कांग्रेस आंदोलन के दौरान एक महिला पुलिसकर्मी के कथित यौन उत्पीड़न का मामला उठाया।

केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, “दो दिन पहले, एक विरोध प्रदर्शन के दौरान एक महिला पुलिसकर्मी के साथ लगभग छेड़छाड़ की गई थी। हम वीडियो दिखा सकते हैं। प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी। इसी तरह, कल (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शन की भी अनुमति नहीं है।”

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मेहता ने ट्रेनों और दिल्ली मेट्रो पर प्रतिबंध सहित सुरक्षा व्यवस्था का मामला बनाते हुए आरोप लगाया कि जुलाई में राष्ट्रीय राजधानी में सीजेपी विरोध प्रदर्शन के दौरान 200 से अधिक कार्यकर्ता घायल हो गए।

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यह टिप्पणियाँ तीन महिला पत्रकारों द्वारा आरोप लगाए जाने के कुछ दिनों बाद आईं कि पुलिस कर्मियों ने उनका यौन उत्पीड़न किया और तीन महीने बाद कई सीजेपी प्रदर्शनकारियों ने इसी तरह के आरोप लगाए।

सीपीआई (एम) के महासचिव एमए बेबी ने 10 अक्टूबर को 57 दिल्ली मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और नई दिल्ली और हजरत निज़ामुद्दीन के लिए ट्रेनों को रद्द करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, और आरोप लगाया कि यह उपाय मनमाना, अनुपातहीन और कानूनी अधिकार के बिना था।

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मेहता ने तर्क दिया कि सीजेपी ने जुलाई में प्रदर्शन करने की अनुमति मांगी थी और उसे उसी दिन अनुमति दे दी गई थी। उन्होंने कहा कि आयोजकों ने अधिकारियों द्वारा लगाई गई शर्तों का पालन करने पर सहमति जताते हुए एक लिखित आश्वासन भी दिया है। उन्होंने कहा कि अनुमति एक दिन के लिए थी, लेकिन आंदोलन 17 दिनों तक जारी रहा.

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उन्होंने आरोप लगाया कि विरोध प्रदर्शन के दौरान कई आपराधिक उल्लंघन दर्ज किए गए।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा कि मेट्रो और अन्य रेल सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता. “आप एक मक्खी को मारने के लिए हथौड़े का उपयोग नहीं कर सकते”, इसने टिप्पणी की।

अदालत ने बंद मेट्रो स्टेशनों की संख्या कम करने की मांग कर रहे केंद्र के वकील से कहा, “युवा, बूढ़े सभी यात्रा करते हैं। यात्रियों को बुनियादी सुविधाएं पाने का अधिकार है।” अदालत ने कहा, “प्रतिबंध और पूर्ण बंदी के बीच अंतर है।

अदालत ने सुझाव दिया कि अधिकारियों को प्रतिबंध लगाते समय संतुलन बनाए रखना चाहिए ताकि आम नागरिकों को न तो असुविधा हो और न ही खतरा हो।

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अदालत ने कहा, “हम यह स्पष्ट करते हैं कि मेट्रो की आवाजाही पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल अधिकारियों को प्रतिबंध पर पुनर्विचार करने और मेट्रो और अन्य ट्रेनों को इतने नियमित तरीके से अनुमति देने के लिए प्रभावित करने पर सहमत हुए हैं कि आनुपातिकता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, दिल्ली के निवासियों को कोई असुविधा न हो।”

इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए संयुक्त पुलिस आयुक्त नूपुर प्रसाद ने कहा कि जब महिलाओं की सुरक्षा की बात आती है, तो पुलिस कर्मियों और आम नागरिकों के बीच कोई अंतर नहीं होना चाहिए।

“हम समाज का हिस्सा हैं और आपकी सुरक्षा के लिए यहां हैं। हमारी महिला कर्मी भी आपकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वहां थीं। अगर उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया है, तो यह सिर्फ पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है, यह हर किसी की जिम्मेदारी है। हर किसी को उस मानसिकता की निंदा करनी चाहिए जो किसी को किसी अन्य व्यक्ति के साथ इस तरह का व्यवहार करने की अनुमति देती है। इस मामले में उचित कानूनी कार्रवाई भी की जा रही है।”


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