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कौन थे रामचन्द्र छत्रपति, जिनकी हत्या के मामले में राम रहीम हुए बरी?

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कौन थे रामचन्द्र छत्रपति, जिनकी हत्या के मामले में राम रहीम हुए थे बरी?रामचन्द्र छत्रपति को गोली लगी और इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। (फाइल फोटो/पीटीआई)

आखरी अपडेट: मार्च 07, 2026, 11:23 IST

 

गुरमीत राम रहीम बरी हो गए हैं, यह खबर आज न्यायपालिका और मीडिया जगत में चर्चा का मुख्य विषय बनी हुई है। मशहूर पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति की हत्या के मामले में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने उनके खिलाफ पेश किए गए सीबीआई के सबूतों को पुख्ता नहीं माना और हत्या के आरोपों से उन्हें मुक्त कर दिया है। रामचन्द्र की मौत ने देश में पत्रकारों की सुरक्षा और न्याय प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।

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गुरमीत राम रहीम बरी: हाई कोर्ट का अहम फैसला और इसके मायने

पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति अपनी मौत के करीब 24 साल बाद एक बार फिर सुर्खियों में हैं। गौरतलब है कि साल 2019 में सीबीआई की विशेष अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने राम रहीम को इस हत्या के आरोप में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की कड़ी सजा सुनाई थी। लेकिन अब हाई कोर्ट ने राम रहीम की अपील स्वीकार कर ली है। गुरमीत राम रहीम बरी होने के साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया है कि मुख्य आरोपी को सीधे तौर पर हत्या से जोड़ने वाले अकाट्य साक्ष्यों (Concrete Evidence) की कमी थी।

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हालांकि, कोर्ट ने इस हत्याकांड में शामिल तीन अन्य आरोपियों — कुलदीप, निर्मल और किशन लाल — की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है।

पत्रकार हत्याकांड में गुरमीत राम रहीम बरी क्यों हुए? सबूतों की कमी की कहानी

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस हाई-प्रोफाइल मामले में कड़ियों को जोड़ने में जांच एजेंसी पूरी तरह से सफल नहीं हो पाई। आपको बता दें कि रामचन्द्र छत्रपति ही वह निडर पत्रकार थे, जिन्होंने अपने समाचार पत्र ‘पूरा सच’ के माध्यम से डेरा सच्चा सौदा के भीतर चल रहे यौन शोषण के काले सच को पहली बार दुनिया के सामने रखा था। 24 अक्टूबर 2002 को उन्हें उनके घर के बाहर गोली मार दी गई थी और बाद में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

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गुरमीत राम रहीम बरी होने के बावजूद क्या जेल में रहेंगे? जानिए आगे क्या होगा

जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इस फैसले के बाद राम रहीम जेल से बाहर आ जाएंगे? इसका जवाब है- नहीं। भले ही पत्रकार हत्याकांड में गुरमीत राम रहीम बरी कर दिए गए हों, लेकिन वह अभी रोहतक की सुनारिया जेल में ही रहेंगे। साध्वी यौन शोषण मामले में उन्हें पहले ही 20 साल की सजा सुनाई जा चुकी है और वे उस जघन्य अपराध के लिए अपनी सजा काट रहे हैं।

यह फैसला भारतीय न्याय प्रणाली के उस सिद्धांत को दर्शाता है जहाँ किसी भी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक कि आरोप ‘संदेह से परे’ (Beyond Reasonable Doubt) साबित न हो जाएं।

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कौन थे रामचन्द्र छत्रपति

रामचन्द्र छत्रपति भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक ऐसा नाम हैं, जो साहस, सत्य और निडरता का पर्याय बन चुके हैं। हरियाणा के सिरसा में जन्मे और पले-बढ़े छत्रपति ने अपनी कलम को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। आज जब भी खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) की बात होती है, तो उनका नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। उन्होंने अपने अखबार ‘पूरा सच’ के जरिए वह कर दिखाया, जिसे करने की हिम्मत बड़े-बड़े मीडिया घराने भी नहीं जुटा पा रहे थे।

रामचन्द्र छत्रपति का ‘पूरा सच’ और पत्रकारिता का सफर

पेशे से वकील रहे छत्रपति ने बाद में पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और साल 2000 में ‘पूरा सच’ नाम से एक सांध्य दैनिक अखबार शुरू किया। रामचन्द्र छत्रपति का उद्देश्य समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और अन्याय को उजागर करना था। उनका अखबार बहुत जल्द सिरसा और आसपास के इलाकों में लोगों की आवाज बन गया। वह किसी भी राजनीतिक या धार्मिक दबाव के आगे झुकने वाले व्यक्ति नहीं थे।

यही वह समय था जब डेरा सच्चा सौदा का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था, लेकिन उसके अंदर चल रही अमानवीय गतिविधियों की भनक बाहर किसी को नहीं थी।

कैसे रामचन्द्र छत्रपति ने किया डेरा सच्चा सौदा का पर्दाफाश?

साल 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक साध्वी ने अनाम चिट्ठी लिखी थी, जिसमें डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम द्वारा किए जा रहे यौन शोषण का जिक्र था। इस चिट्ठी की प्रति कई संस्थानों को भेजी गई, लेकिन किसी ने इसे छापने की हिम्मत नहीं की। रामचन्द्र छत्रपति ही वह साहसी पत्रकार थे, जिन्होंने इस चिट्ठी को अपने अखबार ‘पूरा सच’ में प्रमुखता से प्रकाशित किया। इस खुलासे ने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया और डेरा प्रमुख के काले साम्राज्य की नींव हिला दी।

रामचन्द्र छत्रपति की शहादत और न्याय के लिए उनके परिवार की लड़ाई

सच उजागर करने की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। 24 अक्टूबर 2002 को रामचन्द्र छत्रपति को उनके घर के बाहर गोलियों से छलनी कर दिया गया। 21 नवंबर 2002 को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी हत्या के बाद उनके बेटे अंशुल छत्रपति ने न्याय के लिए एक लंबी और कठिन कानूनी लड़ाई लड़ी। दशकों के संघर्ष के बाद, अंततः अदालत ने डेरा प्रमुख और अन्य दोषियों को हत्या के आरोप में सजा सुनाई, जो भारत में सत्य की जीत का एक बड़ा प्रतीक बनी।

आज भी उनका जीवन हर उस युवा पत्रकार के लिए एक प्रेरणा है, जो बिना डरे समाज की सच्चाई को सामने लाने का सपना देखता है।

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