धर्म

वाल्मिकी जयंती आत्मशुद्धि, सदाचार एवं नवजीवन का शाश्वत संदेश देती है।

‘रामायण’ के रचयिता महर्षि वाल्मिकी के अनूठे संदेशों को फैलाने के लिए हर साल आश्विन मास की पूर्णिमा के दिन महर्षि वाल्मिकी जयंती मनाई जाती है और इस साल वाल्मिकी जयंती 26 अक्टूबर को मनाई जा रही है। ऐसा माना जाता है कि महर्षि वाल्मिकी के सम्मान में उनकी जयंती रामायण काल ​​से मनाई जा रही है। इस अवसर पर देशभर में कई तरह के सामाजिक और धार्मिक आयोजन किये जाते हैं। सनातन धर्म के प्रमुख ऋषियों में से एक महर्षि वाल्मिकी द्वारा संस्कृत भाषा में लिखी गई रामायण सबसे प्राचीन मानी जाती है और क्योंकि उन्होंने प्रथम संस्कृत महाकाव्य ‘रामायण’ की रचना की थी, इसलिए उन्हें ‘आदिकवि’ भी कहा जाता है।

वाल्मिकी द्वारा लिखित मोक्षदायिनी रामायण आज भी वेदों की तरह दुनिया भर में प्रसिद्ध है, जो 21 भाषाओं में उपलब्ध है और सनातन धर्म को मानने वालों के लिए पूजनीय है। रामायण ने देश को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांधने का बहुत महत्वपूर्ण काम किया। देश की अमूल्य निधि रामायण का प्रत्येक अक्षर अमरत्व का सूचक और महान पापों का नाश करने वाला माना जाता है। वाल्मिकी कृत रामायण को महाकाव्य ज्ञान-विज्ञान, भाषा ज्ञान, ललित कला, ज्योतिष, आयुर्वेद, इतिहास और राजनीति का केंद्र बिंदु माना जाता है। यह महाकाव्य श्री राम के जीवन के माध्यम से जीवन के सत्य और कर्तव्य का परिचय देता है। जिस प्रकार महर्षि वाल्मिकी ने रामायण में कई स्थानों पर सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों की सटीक गणना की है, उससे यह स्पष्ट है कि वह एक अत्यंत ज्ञानी व्यक्ति थे जिन्हें ज्योतिष और खगोल विज्ञान का भी बहुत गहरा ज्ञान था।

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रामायण को वैदिक जगत का प्रथम काव्य माना जाता है, जिसमें कुल चौबीस हजार श्लोक हैं। ऐसा माना जाता है कि इस संसार में सबसे पहले श्लोक की रचना महर्षि वाल्मिकी ने की थी, जो संस्कृत भाषा के प्रवर्तक हैं। विभिन्न पौराणिक कथाओं में वर्णित है कि महर्षि वाल्मिकी बनने से पहले उनका नाम रत्नाकर था, जो अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए लोगों को लूटा करते थे। एक बार उसकी मुलाकात एक सुनसान जंगल में नारद मुनि से हुई और नारद को पकड़ने के बाद रत्नाकर ने उन्हें भी लूटने की कोशिश की। तब नारद जी ने पूछा कि तुम ऐसा निंदनीय कार्य क्यों करते हो? रत्नाकर ने उत्तर दिया, अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए। तब नारद मुनि जी ने उनसे पूछा कि जिस परिवार के लिए तुम इतने पाप करते हो क्या वह परिवार तुम्हारे पाप कर्मों में भागीदार बनने के लिए तैयार होगा? इसका उत्तर जानने के लिए रत्नाकर नारद मुनि को एक पेड़ से बांधकर घर पहुंचे और एक-एक करके परिवार के सभी सदस्यों से पूछा कि मैं डाकू बनकर लोगों को लूटने का पाप करता हूं, क्या आप उस पाप में मेरे साथ हैं? परिवार के सभी सदस्यों ने कहा कि आप इस परिवार के संरक्षक हैं, इसलिए इस परिवार का भरण-पोषण करना आपका कर्तव्य है, इस पाप में हमारा कोई हिस्सा नहीं है।

सभी का एक ही उत्तर सुनकर रत्नाकर बहुत दुखी हुआ और नारद मुनि के पास पहुंचा और उनके चरणों में गिर पड़ा। तब नारद मुनि ने रत्नाकर को सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने का ज्ञान दिया। जब रत्नाकर ने उससे अपने पापों का प्रायश्चित करने का उपाय पूछा तो नारद मुनि ने उसे ‘राम’ नाम का जाप करने की सलाह दी लेकिन रत्नाकर ने कहा, मुनिवर! मैंने जीवन में इतने पाप किये हैं कि मैं राम का नाम भी नहीं ले सकता। नारद मुनि ने उन्हें ‘मरा-मरा’ जपने को कहा और इस प्रकार ‘मरा-मरा’ जपते-करते रत्नाकर के मुँह से स्वतः ही ‘राम’ नाम का जप होने लगा। वह राम नाम में इतने लीन हो गए कि वर्षों तक तपस्वी के रूप में ध्यान करने और कठोर तपस्या करने के कारण उनके शरीर में चींटियाँ लग गईं। इतनी कठोर तपस्या के बाद उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे रत्नाकर से महर्षि वाल्मिकी बन गये।

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पौराणिक कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि जब भगवान श्री राम ने माता सीता का त्याग कर दिया था, तब माता सीता वनदेवी के नाम से महर्षि वाल्मिकी के आश्रम में रहीं और वहीं उन्होंने लव-कुश को जन्म दिया, जिन्हें महर्षि वाल्मिकी ने ज्ञान दिया। पहली बार लव-कुश ने भगवान श्रीराम को संपूर्ण रामकथा सुनाई थी। यही कारण है कि लव-कुश के जन्म का वृत्तांत वाल्मिकी रामायण में भी मिलता है। हालाँकि, महर्षि वाल्मिकी के जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में नई शुरुआत करने के लिए किसी विशेष समय या अवसर की आवश्यकता नहीं होती है, बल्कि इसके लिए केवल सत्य और धर्म को अपनाने की आवश्यकता होती है। उनका जीवन बुरे कर्मों को त्यागकर अच्छे कर्मों और भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने का मार्ग दिखाता है। महर्षि वाल्मिकी का जीवन समस्त मानव जाति को यह शिक्षा देता है कि मनुष्य को अपने जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयों का सामना करना पड़े, वह चाहे तो अपने साहस, साहस और मानसिक शक्ति के बल पर सभी बाधाओं को पार कर सकता है।

-योगेश कुमार गोयल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और 35 वर्षों से लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं)

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