धर्म

Narak Chaturdashi 2026: नरक चतुर्दशी नरक से मुक्ति और अकाल मृत्यु से सुरक्षा का पर्व है।

कार्तिक कृष्ण पक्ष में मनाए जाने वाले पांच दिवसीय दीपोत्सव का दूसरा पर्व नरक चतुर्दशी है, जिसे छोटी दिवाली, रूप चतुर्दशी और काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। धनतेरस के अगले दिन मनाया जाने वाला यह त्योहार धार्मिक आस्था, पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक संदेशों का अनोखा संगम है। ‘नरक चतुर्दशी’ नाम से ही स्पष्ट है कि इसका संबंध मृत्यु के देवता यमराज और नरक से मुक्ति की मान्यता से है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन यमराज की पूजा, व्रत और दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर हो जाता है और मनुष्य को नरक की यातनाओं से मुक्ति मिल जाती है। यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की, अत्याचार पर न्याय की और अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक है। इस पर्व पर अभ्यंग स्नान का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि शरीर पर तिल का तेल लगाकर सूर्योदय से पहले स्नान करने से रूप, सौंदर्य और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। इस कारण इसे रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। इस दिन घरों की साफ-सफाई, दीपक जलाना, हनुमान जी की पूजा करना और यमराज के निमित्त दीपदान करने की परंपरा भी प्रचलित है। खासतौर पर घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर यमराज से परिवार की सुख-समृद्धि और लंबी उम्र की प्रार्थना की जाती है।

इस वर्ष चतुर्दशी तिथि दो दिन रहने के कारण पर्व की तिथि को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है. कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी 7 नवंबर को सुबह 10:47 बजे से शुरू होगी और 8 नवंबर को सुबह 11:27 बजे तक रहेगी। प्रदोष काल में चतुर्दशी तिथि होने के कारण 7 नवंबर को यम दीपदान, हनुमान पूजा और काली चौदस पूजा की जाएगी जबकि उदयातिथि के अनुसार 8 नवंबर की सुबह अभ्यंग स्नान किया जाएगा। नरक चतुर्दशी न केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व है बल्कि जीवन से नकारात्मकता, अहंकार और बुराई को दूर कर सद्गुणों का प्रकाश फैलाने की प्रेरणा भी देता है। इसका संदेश यह है कि जिस प्रकार दीपक अंधकार को दूर करता है, उसी प्रकार नैतिकता, ज्ञान और सकारात्मकता मानव जीवन से अज्ञान और विकारों के अंधकार को दूर कर सकती है।

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‘नरक चतुर्दशी’ के त्योहार को ‘नरक चौदस’, ‘रूप चतुर्दशी’, ‘काल चतुर्दशी’ और ‘छोटी दिवाली’ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन मृत्यु के देवता यमराज और धर्मराज चित्रगुप्त की पूजा की जाती है और यमराज से प्रार्थना की जाती है कि उनकी कृपा से हमें नरक के भय से मुक्ति मिले। राम भक्त हनुमान का जन्म भी इसी दिन हुआ था और इसी दिन वामन अवतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगते हुए अपने तीन पगों में तीनों लोकों सहित बलि के शरीर को भी नाप लिया था। वैसे तो हनुमान जयंती चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है, लेकिन उत्तर भारत के कई हिस्सों में यह दिवाली से एक दिन पहले भी मनाई जाती है। यम को मृत्यु का देवता और संयम का अधिष्ठाता देवता माना जाता है। नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना शुभ माना जाता है और शाम के समय यम के लिए दीप दान किया जाता है। तात्पर्य यह है कि जो लोग संयम के नियमों का पालन करते हैं, उन्हें मृत्यु से बिल्कुल भी नहीं डरना चाहिए। इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करने का अर्थ आलस्य का त्याग करना है और इसका सीधा संदेश यह है कि संयम और नियम से रहने से उनका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा और उनकी अपनी साधना ही उनकी रक्षा करेगी।

नरक चतुर्दशी से भगवान श्री कृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। नरक चतुर्दशी मनाने के संबंध में मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने प्रागज्योतिषपुर के राजा ‘नरकासुर’ नामक अधर्मी राक्षस का वध किया था और ऐसा करके उन्होंने न केवल पृथ्वीवासियों बल्कि देवताओं को भी उसके अत्याचारों से मुक्त कराया था। उसके आतंक से पृथ्वी के सभी योद्धा और सम्राट कांपते थे। नरकासुर अपनी शक्ति के नशे में चूर होकर अपनी शक्ति का दुरुपयोग करता था और महिलाओं पर भी अत्याचार करता था। उसने 16000 मानव, देव और गंधर्व कन्याओं को बंदी बना रखा था। देवताओं और ऋषियों के अनुरोध पर भगवान श्री कृष्ण ने सत्यभामा की मदद से नरकासुर का वध किया और 16,000 लड़कियों को उसकी कैद से मुक्त कराया। नरकासुर से मुक्ति पाकर देवता और पृथ्वीवासी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने यह उत्सव मनाया। माना जाता है कि तभी से इस त्योहार को मनाने की परंपरा शुरू हुई।

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धनतेरस, नरक चतुर्दशी और दिवाली के दिन दीपक जलाने के संबंध में यह भी मान्यता है कि इन दिनों भगवान वामन ने अपने तीन पगों में संपूर्ण पृथ्वी, पाताल, ब्रह्मांड और महादानी दैत्यराज बलि के शरीर को नाप लिया था और इन तीन पगों के महत्व के कारण ही लोग यम की यातना से मुक्ति पाने के उद्देश्य से तीन दिनों तक दीपक जलाते हैं और सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं। यह भी कहा जाता है कि बाली की उदारता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने बाद में बाली को पाताल का शासन सौंप दिया और उसे आशीर्वाद दिया कि उसकी याद में पृथ्वीवासी हर साल लगातार तीन दिनों तक उसके लिए दीपदान करेंगे। नरक चतुर्दशी का संबंध स्वच्छता से भी है। इस दिन लोग अपने घरों से कूड़ा-कचरा बाहर निकालते हैं। इसके अलावा यह भी माना जाता है कि इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले तेल-उबटन लगाकर स्नान करने से पुण्य मिलता है।

-योगेश कुमार गोयल
(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदी अकादमी, दिल्ली के सौजन्य से प्रकाशित पुस्तक ‘फ्रॉम सी टू स्पेस: इंडियाज डिफेंस रिवोल्यूशन’ के लेखक हैं)

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