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भयानक ईरान संकट: जयशंकर की कूटनीतिक पहल और भारतीयों की वापसी का सच

ईरान संकट (Iran Crisis) ने इस समय पूरी दुनिया की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हालिया हमलों के बाद मध्य पूर्व में तनाव अपने चरम पर है। इस गंभीर ईरान संकट के बीच, भारत सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर पूरी तरह अलर्ट मोड में आ गई है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पिछले कुछ दिनों में अपने ईरानी समकक्ष के साथ तीन महत्वपूर्ण दौर की वार्ताएं की हैं।

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ईरान संकट के बीच जयशंकर की समुद्री सुरक्षा पर अहम वार्ता

गुरुवार दोपहर विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई एक प्रेस वार्ता के अनुसार, दोनों नेताओं के बीच सबसे ताज़ा बातचीत मुख्य रूप से समुद्री नौवहन और सुरक्षा पर केंद्रित थी। यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि ईरान पर हमलों के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर भारी दबाव है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की अस्थिरता का खतरा पैदा हो गया है। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस संवेदनशील मुद्दे पर अभी आगे की कोई भी टिप्पणी करना “समय से पहले” होगा।

यह कूटनीतिक हलचल ऐसे समय में हुई है जब सऊदी अरब से कच्चा तेल ले जाने वाला लाइबेरिया के झंडे वाला एक टैंकर सुरक्षित रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को पार कर भारत पहुंचने वाला पहला जहाज बन गया है।

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ईरान संकट में फंसे भारतीयों का क्या है हाल?

भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता अपने नागरिकों की सुरक्षा है। विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है कि कई भारतीय नागरिक ईरान से सुरक्षित स्वदेश लौट आए हैं। इसके अलावा, युद्धग्रस्त देश के अंदर कई अन्य लोगों को तेहरान से निकालकर सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचाया गया है।

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मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया, “ईरान में हमारे लगभग 9,000 भारतीय नागरिक हैं, जिनमें छात्र, नाविक, व्यवसायी और तीर्थयात्री शामिल हैं। हमने हाल ही में एक एडवाइजरी जारी की थी। इस एडवाइजरी का पालन करते हुए कई नागरिक, विशेषकर छात्र, देश छोड़कर अपने घर लौट आए हैं।”

तीसरे देशों के रास्ते सुरक्षित वापसी

भारत सरकार तेहरान में फंसे नागरिकों को अजरबैजान और आर्मेनिया के माध्यम से भूमि-सीमा पार करने में भी सहायता कर रही है, ताकि वे वहां से भारत के लिए वाणिज्यिक उड़ानें ले सकें। विदेश मंत्री जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि इस ईरान संकट और मध्य पूर्व के संघर्ष को हल करने का एकमात्र रास्ता कूटनीति और बातचीत है।

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ईरान संकट का तेल आपूर्ति और भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

जयशंकर ने इस बात पर भी जोर दिया कि मध्य पूर्व भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र भारत का एक प्रमुख व्यापारिक भागीदार भी है, जिसके साथ सालाना 200 मिलियन डॉलर का व्यापार होता है। 28 फरवरी को शुरू हुए इस संयुक्त अमेरिकी-इजरायली हमले ने ईरान के तेल और आर्थिक बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है।

होर्मुज जलडमरूमध्य, जहाँ से दुनिया की लगभग 20% तेल आपूर्ति होती है, उस पर ईरान का भौगोलिक नियंत्रण है और फिलहाल वहां सैन्य नाकाबंदी है। इसके परिणामस्वरूप ब्रेंट क्रूड की कीमतों में भारी उछाल आया है। हालांकि, भारत सरकार ने ऊर्जा संकट की चिंताओं को कम करते हुए आश्वस्त किया है कि देश के पास किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त पेट्रोलियम और गैस भंडार मौजूद हैं।

ईरान संकट में भारतीय नागरिकों की दुखद मौत

दुर्भाग्यवश, इस लड़ाई में अब तक दो भारतीय नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। पिछले हफ्ते ओमान के उत्तरी तट पर ‘स्काईलाइट’ (पलाऊ के झंडे वाले तेल टैंकर) पर हुए हमले में बिहार के कैप्टन आशीष कुमार और राजस्थान के दलीप सिंह की मौत हो गई थी। इसके अलावा, मुंबई के रहने वाले दीक्षित सोलंकी फिलहाल लापता बताए जा रहे हैं। अकेले ईरान में इस संघर्ष के कारण 1,300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।

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