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वर्टिकल फिल्म निर्माण: भारत में डिजिटल सिनेमा का जबरदस्त और क्रांतिकारी भविष्य

वर्टिकल फिल्म निर्माण: भारत में डिजिटल सिनेमा का जबरदस्त और क्रांतिकारी भविष्य

वर्टिकल फिल्म निर्माण आज के डिजिटल युग में केवल एक अस्थायी चलन नहीं, बल्कि एक बुनियादी आवश्यकता बन चुका है। भारत में स्मार्टफोन और इंटरनेट के बढ़ते उपयोग ने दर्शकों के कंटेंट देखने के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है। इसी ज्वलंत विषय पर हाल ही में प्रतिष्ठित ‘बेंगलुरु इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ (BIFFES) में एक गहन पैनल चर्चा आयोजित की गई।

पत्रकार सुनयना सुरेश द्वारा संचालित इस चर्चा में सिनेमा और डिजिटल जगत की कई जानी-मानी हस्तियों ने भाग लिया, जिनमें अभिनेता और फिल्म निर्माता राजश्री पोन्नपा, प्रख्यात सिनेमैटोग्राफर मनोहर जोशी, कंटेंट रणनीतिकार लोवेनिथ एस. रामापुरे और निर्माता वर्षा शामिल थीं। इस चर्चा ने स्पष्ट कर दिया कि भारत के तेजी से विकसित हो रहे डिजिटल सामग्री परिदृश्य में 9:16 आस्पेक्ट रेशियो (Aspect Ratio) वाली फिल्मों का भविष्य बेहद उज्ज्वल है।

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वर्टिकल फिल्म निर्माण क्या है और इसका महत्व क्या है?

वर्टिकल फिल्म निर्माण का सीधा सा अर्थ है—ऐसी वीडियो सामग्री का निर्माण जिसे 9:16 आस्पेक्ट रेशियो में शूट और एडिट किया गया हो। यह प्रारूप विशेष रूप से स्मार्टफोन पर देखने के लिए डिज़ाइन किया गया है, ताकि दर्शकों को अपना फोन घुमाना (Landscape mode) न पड़े।

पैनलिस्टों ने इस बात पर जोर दिया कि यद्यपि भारत में यह प्रारूप अभी अपनी शुरुआती अवस्था में है, लेकिन इसे अपनाने की गति अभूतपूर्व है। यह दर्शकों की ‘फोन-फर्स्ट’ (Phone-First) आदतों की ओर एक स्पष्ट और निर्णायक बदलाव का संकेत देता है। लोग अब सफर करते हुए, काम के बीच छोटे ब्रेक में, या आराम करते हुए त्वरित और प्रभावी कंटेंट देखना पसंद करते हैं।

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वर्टिकल फिल्म निर्माण: वैश्विक रुझान बनाम भारतीय बाजार

वैश्विक स्तर पर वर्टिकल सिनेमा ने पहले ही अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। विशेषज्ञों ने चीन का उदाहरण दिया, जहां ‘माइक्रो-ड्रामा’ (Micro-Drama) श्रृंखलाओं ने एक बेहद मजबूत और लाभदायक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) बना लिया है। भारत भी अब उसी पथ पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।

  • नए प्लेटफॉर्म्स का उदय: लगभग एक साल पहले लॉन्च किए गए ‘ज़ी बुलेट’ (Zee Bullet) जैसे प्लेटफॉर्म इस बात का प्रारंभिक संकेतक हैं कि भारतीय उद्योग वर्टिकल स्टोरीटेलिंग में कितनी गहरी दिलचस्पी ले रहा है।

  • प्रवेश में आसानी: कुकू एफएम (Kuku FM) में अपने अनुभव साझा करते हुए श्री रामापुरे ने बताया कि इस प्रारूप ने नए रचनाकारों के लिए प्रवेश की बाधाओं (Entry Barriers) को काफी कम कर दिया है।

  • प्लेटफॉर्म्स की संख्या: वर्तमान में 25 से अधिक वर्टिकल-विशिष्ट प्लेटफॉर्म सक्रिय हैं, और जल्द ही कई बड़े खिलाड़ियों के इस क्षेत्र में प्रवेश करने की उम्मीद है।

वर्टिकल फिल्म निर्माण में रचनात्मक और तकनीकी चुनौतियां

लघु और ऊर्ध्वाधर (Vertical) प्रारूप केवल स्क्रीन का आकार नहीं बदलता, बल्कि यह कहानी कहने के पूरे व्याकरण को बदल देता है।

1. कहानी कहने (Storytelling) का नया और तेज अंदाज

अभिनेत्री और फिल्म निर्माता सुश्री पोन्नपा के अनुसार, जो लेखक लंबे प्रारूप वाली पारंपरिक कहानियों (Long-form storytelling) के आदी हैं, उनके लिए यह बदलाव चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।

  • 10-सेकंड का नियम: वर्टिकल कंटेंट में यदि पहले 10 सेकंड के भीतर दर्शक के साथ कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं बनता, तो वे तुरंत ‘स्वाइप’ (Swipe) करके आगे बढ़ जाते हैं।

  • तात्कालिकता: पारंपरिक सिनेमा के विपरीत, जहां कहानी धीरे-धीरे विकसित होती है, ऊर्ध्वाधर सामग्री में तात्कालिकता (Urgency) और तेज गति की सख्त आवश्यकता होती है। ‘बुलेट ऐप’ के लिए अपने प्रोजेक्ट ‘फूल सा चारा’ का उदाहरण देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि इस माध्यम में तेज निष्पादन और मजबूत भावनात्मक धड़कन (Emotional beats) आवश्यक हैं।

2. सिनेमैटोग्राफी और विजुअल ग्रामर

सिनेमैटोग्राफर श्री मनोहर जोशी ने एक बहुत ही तकनीकी लेकिन महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि हालांकि वर्टिकल फिल्म निर्माण में भी रोशनी और कैमरे के बुनियादी सिद्धांत वही रहते हैं, लेकिन इसका ‘दृश्य व्याकरण’ (Visual Grammar) बिल्कुल नया है। इसमें रचना (Composition) और कैमरा एंगल के साथ प्रयोग करने की असीमित संभावनाएं हैं, क्योंकि इस प्रारूप का अभी तक कोई निश्चित और कठोर ढांचा (Fixed Framework) नहीं है।

सिनेमा को खतरा नहीं, बल्कि माध्यम का विस्तार

एक आम चिंता यह है कि क्या ऐसे छोटे और त्वरित प्रारूप पारंपरिक सिनेमा की कला को कमजोर कर देंगे? पैनल ने इस धारणा को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

श्री जोशी ने एक बहुत ही सटीक तुलना करते हुए कहा कि यह बदलाव बिल्कुल वैसा ही है जैसे रेडियो से ‘पॉकेट ट्रांजिस्टर’ का आना। यह कहानी कहने की कला का पतन नहीं है, बल्कि केवल कहानी उपभोग करने के माध्यम (Medium) में हुआ एक तकनीकी बदलाव है।

निष्कर्ष: अरबों डॉलर का भविष्य

वर्टिकल फिल्म निर्माण अब सामग्री निर्माताओं के लिए कोई वैकल्पिक शौक नहीं रह गया है; यह भविष्य की अनिवार्यता है। निर्माता सुश्री वर्षा ने सत्र का समापन करते हुए चेतावनी और अवसर दोनों दिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि भारतीय डिजिटल कंटेंट उद्योग आक्रामक रूप से इस दिशा में काम करता है, तो अगले पांच वर्षों में मोबाइल सामग्री बाजार का मूल्य अरबों डॉलर तक पहुंच सकता है। जो रचनाकार और स्टूडियो खुद को इस नए प्रारूप के अनुकूल ढालने में विफल रहेंगे, उनके इस रेस में बहुत पीछे छूट जाने का भारी जोखिम है।

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