धर्म

ज्ञान गंगा: याज्ञवल्क्य ने राम कथा में वह प्रसंग सुनाया, जब हजारों वर्षों की तपस्या के बाद उन्हें राम जैसा पुत्र प्राप्त हुआ।

याज्ञवल्क्यजी महर्षि भारद्वाज को अत्यंत मधुर एवं भावपूर्ण वाणी में श्रीराम की कथा सुनाकर आनंदित कर रहे हैं। भारद्वाज मुनि भगवान के विभिन्न अवतारों की दिव्य गतिविधियों को एकाग्रता से सुन रहे हैं। नारद प्रसंग के बाद याज्ञवल्क्यजी मनु और शतरूपा की घोर तपस्या और उस तपस्या से प्राप्त दिव्य वरदान की कथा सुनाते हैं।
वह मनु, जिन्हें संपूर्ण मानव जाति का पूर्वज कहा जाता है, बहुत ही वीर, तपस्वी और धर्मात्मा राजा थे। उनकी पत्नी शतरूपा भी सदाचार और पतिभक्ति की प्रतिमूर्ति थीं। आज भी वेद उनके पवित्र आचरण की प्रशंसा करते हैं। उनके पुत्र उत्तानपाद से महान भक्त ध्रुव का जन्म हुआ, जिनकी भक्ति अमर है। कर्दम मुनि की पत्नी देवहूति के गर्भ से महर्षि कपिल प्रकट हुए, जिनकी महिमा सारी दुनिया में गाई जाती है।

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मनु ने लम्बे समय तक राज्य पर धर्मपूर्वक शासन किया। सामान्य मनुष्यों की भाँति जीवन के सुख-दुःख भोगते हुए वे वृद्धावस्था तक पहुँच गये, परन्तु उनके मन को कहीं भी स्थिरता प्राप्त नहीं हुई। अंततः उनके भीतर त्याग जाग उठा। उन्होंने राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया और पत्नी सहित वन में जाने का निश्चय किया।
नैमिषारण्य और गोमती के पवित्र तटों से होते हुए वे अनेक संतों-महात्माओं के आश्रमों तक पहुंचते रहे। जंगल में लगातार कठोर तपस्या और कष्ट भी उनके संकल्प को डिगा नहीं सके। उनके हृदय में एक ही चिन्ता थी – कहीं प्रभु के दर्शन के बिना यह नश्वर जीवन व्यर्थ न बीत जाय।
धीरे-धीरे उनकी तपस्या और भी गंभीर हो गई। उन्होंने हजारों वर्षों तक केवल पानी पिया, फिर हवा पर रहे और अंत में हवा भी त्याग दी और एक पैर पर खड़े होकर कठोर तपस्या में लग गए। उनकी अद्वितीय तपस्या को देखकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी कई बार उनके पास आये और उनकी अनेक प्रकार से परीक्षा ली, परंतु वे अपने संकल्प से तनिक भी विचलित नहीं हुए।
उसकी अटूट आस्था और भक्ति से प्रसन्न होकर अंततः आकाशवाणी हुई – “वर मांगो।”
प्रभु की वाणी सुनते ही उसका दुर्बल शरीर फिर से तेजस्वी और बलवान हो गया। मनु ने अत्यंत भावुक होते हुए विनम्र स्वर में कहा-
“हे भगवान! जिनकी वेदों में निरंतर स्तुति की जाती है, जिनके सगुण और निर्गुण दोनों रूपों का ऋषि-मुनि ध्यान करते हैं, हम आपके दिव्य रूप का साक्षात दर्शन करना चाहते हैं। कृपया हमें इस दुःख से मुक्त करें।”
उनकी सरल एवं सच्ची प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान ने अपना सुन्दर रूप प्रकट किया। उनका काला शरीर नीले कमल, नीलमणि और बादल के समान कोमल और सुंदर था। उसके सौन्दर्य का तेज देखकर असंख्य कामदेव भी लज्जित हो जायेंगे। उसका चेहरा शरद पूर्णिमा के चाँद के समान शीतल और प्रसन्न था। होठों की लाली, दांतों की चमक और मधुर मुस्कान एक अनोखा सौंदर्य बिखेर रही थी।
भगवान ने स्नेहपूर्वक कहा, “हे मनु! मैं तुमसे अत्यंत प्रसन्न हूं। तुम्हें जो भी इच्छा हो, निःसंकोच मांग लो।”
मनु ने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया, “हे प्रभु! आपके दर्शन के बाद अब कोई इच्छा शेष नहीं रही। तथापि, मेरी एक इच्छा है – कि मुझे आपके जैसा पुत्र प्राप्त हो।”
भगवान मुस्कुराए और बोले, “हे मनु! मेरे जैसा कोई नहीं है इसलिए मैं स्वयं तुम्हारे यहां पुत्र रूप में अवतार लूंगा।”
यह सुनकर मनु और शतरूपा बहुत प्रसन्न हुए। शतरूपा ने भगवान से उनके चरणों में अटूट भक्ति और निश्छल प्रेम का वरदान भी मांगा। भगवान ने उन दोनों को मनचाहा वर दिया और अंतर्ध्यान हो गये।
कुछ समय बाद मनु और शतरूपा ने अपना शरीर छोड़ दिया। अगले जन्म में वे त्रेता युग में अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के रूप में अवतरित हुए, जहाँ स्वयं भगवान श्री राम उनके पुत्र के रूप में प्रकट हुए और अपना दिव्य नृत्य किया।
..श्रीराम..
– सुखी भारती

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