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भारत को रूसी तेल: अमेरिका की ‘चौंकाने वाली’ मंजूरी, जानिए इस ऐतिहासिक फैसले का सच!

ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट को 6 मार्च, 2026 को वाशिंगटन में व्हाइट हाउस में देखा गया। फोटो साभार: एपी

 

 

भारत को रूसी तेल खरीदने की अमेरिका ने एक अप्रत्याशित और चौंकाने वाली ‘अस्थायी अनुमति’ दे दी है। पश्चिम एशिया (विशेषकर ईरान और इज़राइल) के बीच जारी भीषण संघर्ष के कारण दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति पर गहरा संकट मंडरा रहा है। इस वैश्विक तेल संकट को टालने और बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने यह अहम कूटनीतिक फैसला लिया है।

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भारत को रूसी तेल: पश्चिम एशिया संकट और अमेरिका का यू-टर्न

शुक्रवार (6 मार्च, 2026) को फॉक्स बिजनेस (Fox Business) को दिए एक विशेष साक्षात्कार में अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ने भारत में अपने सहयोगियों को वह रूसी तेल खरीदने की अनुमति दे दी है, जो पहले से ही जहाजों पर लदा हुआ पानी में मौजूद है।

यह फैसला इसलिए भी बेहद अहम है क्योंकि कुछ ही महीने पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन ने नई दिल्ली द्वारा मॉस्को से तेल खरीद पर 25% का दंडात्मक टैरिफ लगाया था। बेसेंट ने कहा, “भारतीय बहुत अच्छे अभिनेता रहे हैं। हमने उनसे इस शरद ऋतु में स्वीकृत रूसी तेल खरीदना बंद करने के लिए कहा था, और उन्होंने ऐसा किया भी। लेकिन दुनिया भर में अस्थायी तेल की कमी को पाटने के लिए, हमने उन्हें फिर से यह छूट दी है।”

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भारत को रूसी तेल: छूट के पीछे की असली वजह क्या है?

इस नीतिगत बदलाव के पीछे एक बड़ी वजह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से आने वाले तेल की आपूर्ति में बाधा और ईरान युद्ध है। अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने भी इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि दक्षिण एशिया के आसपास जहाजों पर पहले से ही लाखों बैरल रूसी कच्चा तेल फंसा हुआ है।

  • आपूर्ति सुनिश्चित करना: फंसे हुए तेल को जल्द से जल्द रिफाइनरियों तक पहुंचाकर वैश्विक बाजार में तेल का प्रवाह बनाए रखना।
  • कीमतों पर नियंत्रण: जब भारतीय रिफाइनरियां इस उपलब्ध तेल को खरीद लेंगी, तो वैश्विक बाजार में अन्य रिफाइनरियों के लिए तेल खरीदने की प्रतिस्पर्धा कम हो जाएगी, जिससे कीमतें स्थिर रहेंगी।
  • ईरान का दबाव कम करना: वैश्विक ऊर्जा को बंधक बनाने के ईरान के प्रयास को विफल करना।

भारत को रूसी तेल: क्या यह रूस के प्रति अमेरिकी नीति में बदलाव है?

अमेरिकी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह रूस के प्रति उनकी दीर्घकालिक नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं है। यह महज़ 30 दिनों की एक “अस्थायी छूट” (Stap-gap measure) है।

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ट्रेजरी सचिव बेसेंट ने साफ किया कि यह जानबूझकर उठाया गया एक अल्पकालिक कदम है, जो रूसी सरकार को कोई नया या महत्वपूर्ण वित्तीय लाभ नहीं देगा, क्योंकि यह केवल उसी तेल से जुड़े लेनदेन को अधिकृत करता है जो पहले से ही समुद्र में फंसा हुआ है। अमेरिका को अब भी पूरी उम्मीद है कि इस संकट के टलने के बाद नई दिल्ली अमेरिकी तेल की अपनी खरीद में इजाफा करेगी।

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