धर्म

वट सावित्री व्रत 2026: विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए 16 मई को वट सावित्री व्रत रखेंगी।

इस बार वट सावित्री व्रत और सोमवती अमावस्या का विशेष संयोग बन रहा है। वट सावित्री व्रत 16 मई को है. ज्येष्ठ माह में पड़ने वाले सभी व्रतों में वट सावित्री व्रत बहुत प्रभावशाली माना जाता है। जिसमें सौभाग्यवती महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सभी प्रकार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर, जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि इस बार वट सावित्री व्रत 16 मई को पड़ रहा है। वट सावित्री व्रत उत्तर भारत में ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से अमावस्या तक और दक्षिण भारत में ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की इन्हीं तिथियों पर मनाया जाता है। वट सावित्री व्रत उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, दिल्ली और हरियाणा समेत उत्तर भारत के कई स्थानों पर मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि बरगद के पेड़ की उम्र विवाहित महिलाओं के बराबर होती है और वे अपने पति की उम्र भी बरगद के पेड़ के बराबर करने के लिए कहती हैं। बरगद के पेड़ को हिंदू धर्म में पूजनीय माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस वृक्ष में सभी देवी-देवताओं का वास होता है। इस वृक्ष की पूजा करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसके अलावा इस दिन वट वृक्ष को जल से सींचें और उसके तने पर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करें।
 
ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं और वट वृक्ष के पास जाकर धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पूजा करती हैं। इसके साथ ही रोली और अक्षत चढ़ाकर वट वृक्ष पर कलावा बांधती हैं और हाथ जोड़कर वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं। जिससे उसके पति के जीवन में आने वाली बाधाएं दूर हो जाती हैं और उसे लंबी उम्र मिलती है। सोमवती अमावस्या पर स्नान, दान, पितरों की पूजा और धन प्राप्ति जैसे विशेष उपाय भी किए जाते हैं। अमावस्या तिथि के दिन महिलाएं एक बांस की टोकरी में सात अनाजों के ऊपर ब्रह्मा और वट सावित्री तथा दूसरी टोकरी में सत्यवान और सावित्री की मूर्ति रखकर वट के पास जाती हैं और उनकी पूजा करती हैं। इस दिन यम की भी पूजा की जाती है और बरगद के पेड़ की परिक्रमा करते हुए 108 बार कलावा लपेटा जाता है। मंत्र का जाप करते हुए सावित्री को अर्घ्य दिया जाता है। सौभाग्य पेटी और पूजन सामग्री किसी योग्य साधक को दी जाती है। इस व्रत में सत्यवान और सावित्री की कथा सुनी जाती है।

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वट सावित्री व्रत

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि पंचांग के अनुसार वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि 16 मई को सुबह 05:11 बजे से शुरू होगी और 17 मई को सुबह 01:30 बजे समाप्त होगी। ऐसे में वट सावित्री व्रत 16 मई 2026 को मनाया जाएगा. शास्त्रों के अनुसार यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए है. इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, सफलता, स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखती हैं। इसके प्रभाव से रिश्तों में प्यार, विश्वास और खुशियां बनी रहती हैं।

शुभ योग

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि पंचांग के अनुसार 16 मई को शनि जयंती के साथ शनिश्चरी अमावस्या का भी संयोग बन रहा है, जिससे यह दिन दोगुना फलदायी बन गया है। शनि अमावस्या पर व्रत रखने और शनिदेव की पूजा करने का विशेष महत्व है, इसलिए इस बार का संयोग भक्तों के लिए बहुत शुभ माना जा रहा है। इसके अलावा इस दिन सौभाग्य योग और शोभन योग भी बन रहा है। सौभाग्य योग 15 मई को दोपहर 2:21 बजे से 16 मई को सुबह 10:26 बजे तक रहेगा, इसके बाद शोभन योग शुरू हो जाएगा और 17 मई को सुबह 6:15 बजे तक प्रभावी रहेगा। ये दोनों योग शुभ कार्यों और पूजा-पाठ के लिए बेहद लाभकारी माने गए हैं। शनि जयंती के दिन सुबह से शाम 5:30 बजे तक भरणी नक्षत्र रहेगा, उसके बाद कृत्तिका नक्षत्र का प्रभाव शुरू हो जाएगा। भरणी नक्षत्र का स्वामी शुक्र और देवता यमराज को माना जाता है, जबकि कृत्तिका नक्षत्र का स्वामी सूर्य और देवता अग्नि हैं। इन सभी संयोगों के कारण इस वर्ष शनि जयंती का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है।

पूजा सामग्री

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि वट सावित्री व्रत की पूजन सामग्री में सावित्री-सत्यवान की मूर्ति, धूप, दीप, घी, बांस का पंखा, लाल कलावा, सुहाग का सामान, कच्चा सूत, चना (भिगोया हुआ), बरगद का फल, जल से भरा हुआ घड़ा आदि शामिल होना चाहिए।
 

पूजा विधि

ज्योतिषाचार्य और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि इस दिन सुबह घर की साफ-सफाई करें और दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर स्नान करें। इसके बाद पूरे घर में पवित्र जल छिड़कें। बांस की टोकरी में सप्त धान्य भरकर ब्रह्मा की मूर्ति स्थापित करें। ब्रह्मा के बाईं ओर सावित्री की मूर्ति स्थापित करें। इसी प्रकार दूसरी टोकरी में सत्यवान और सावित्री की मूर्ति स्थापित करें। इन टोकरियों को बरगद के पेड़ के नीचे ले जाकर रख दें। इसके बाद ब्रह्मा और सावित्री की पूजा करें। अब सावित्री और सत्यवान की पूजा करते हुए वट वृक्ष की जड़ में जल दें। पूजा में जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल और धूप का प्रयोग करें। बरगद के पेड़ को जल से सींचें, उसके तने पर कच्चा धागा लपेटें और उसकी तीन बार परिक्रमा करें। बरगद के पत्तों से बने आभूषण पहनकर वट सावित्री की कथा सुनें। भीगे हुए चनों की थैली निकालकर उसमें नकदी रखें और अपनी सास के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लें। यदि आपकी सास घर पर नहीं है तो बायना बनाकर उन्हें दे दें। पूजा के अंत में कपड़े और फल आदि को बांस के पात्र में रखकर ब्राह्मणों को दान करें। इस व्रत के दौरान सावित्री-सत्यवान की पुण्य कथा सुनना न भूलें। पूजा करते समय यह कथा दूसरों को भी सुनाएं।
 

महत्त्व

शास्त्रों के अनुसार, वट वृक्ष के नीचे बैठकर सावित्री ने अपने पति सत्यवान को पुनः जीवित कर लिया था। दूसरी कथा के अनुसार, भगवान शिव के आशीर्वाद से ऋषि मार्कंडेय को वट वृक्ष के पत्ते पर बाल मुकुंद को अपने पैर का अंगूठा चूसते हुए दिखाई दिया, तभी से वट वृक्ष की पूजा की जाती है। बरगद के पेड़ की पूजा करने से घर में सुख-शांति और मां लक्ष्मी का भी वास होता है।
 

सावित्री की कहानी

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि सावित्री राजर्षि अश्वपति की इकलौती संतान थीं। सावित्री ने वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। लेकिन जब नारद जी ने उन्हें बताया कि सत्यवान अल्पायु है, तब भी सावित्री अपने निर्णय से नहीं डिगी। उसने सारा राजसी वैभव त्याग दिया और सत्यवान के साथ जंगल में रहकर उसके परिवार की सेवा करने लगी। सत्यवान जिस दिन महाप्रयाण कर रहा था, उस दिन वह जंगल में लकड़ी काटने गया। वहीं बेहोश होकर गिर पड़े। उसी समय यमराज सत्यवान के प्राण लेने आये। तीन दिन से व्रत कर रही सावित्री को उस पल के बारे में पता था, इसलिए बिना घबराए उसने यमराज से सत्यवान के प्राण न लेने की प्रार्थना की। लेकिन यमराज नहीं माने. तब सावित्री उनके पीछे-पीछे चलने लगी। कई बार मना करने पर भी वह नहीं मानी तो यमराज ने सावित्री के साहस और त्याग से प्रसन्न होकर उससे तीन वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने सत्यवान के अंधे माता-पिता की आंखों की रोशनी मांगी, उनका छीना हुआ राज्य मांगा और अपने लिए 100 पुत्रों का वरदान मांगा। तथास्तु कहने पर यमराज को समझ आ गया कि अब सावित्री के पति को साथ ले जाना संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने सावित्री को अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया और सत्यवान को छोड़कर वहां से चले गए।
– डॉ. अनिश व्यास
भविष्यवक्ता और कुंडली विश्लेषक

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