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कालभैरव जयंती 2025: 12 नवंबर को मनाई जाएगी कालभैरव जयंती, कालभैरव पूजा से दूर होते हैं रोग

कालभैरव जयंती 2025: 12 नवंबर को मनाई जाएगी कालभैरव जयंती, कालभैरव पूजा से दूर होते हैं रोग
काल भैरव को भगवान शिव का तीसरा रुद्र अवतार माना जाता है। पुराणों के अनुसार मार्गशीष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन भगवान काल भैरव प्रकट हुए थे। इस बार काल भैरव अष्टमी 22 नवंबर को है. इसी कृष्णाष्टमी को दोपहर के समय भगवान शंकर से भैरव रूप का जन्म हुआ। भगवान भैरव से काल भी डरता है। इसीलिए उन्हें कालभैरव भी कहा जाता है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान, जयपुर-जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि 12 नवंबर को भैरव अष्टमी मनाई जाएगी। भैरव अष्टमी के दिन देवाधिदेव महादेव के रूद्र रूप काल भैरव की पूजा की जाती है। भैरव अष्टमी का व्रत करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। इस दिन भगवान शिव के रौद्र रूप भगवान भैरव की विधि-विधान से पूजा करने का विधान है। इस दिन सुबह व्रत का संकल्प लेकर रात्रि में भगवान कालभैरव की पूजा की जाती है। काल भैरव अष्टमी को कालाष्टमी भी कहा जाता है। कालाष्टमी के दिन शिव शंकर के इसी रूप में भैरव का जन्म हुआ था। भैरव का अर्थ है भय का नाश करने वाला, इसीलिए माना जाता है कि जो भी कालाष्टमी के दिन कालभैरव की पूजा करता है, उसके भय का नाश हो जाता है। कालाष्टमी के दिन भगवान शिव, माता पार्वती और काल भैरव की पूजा करनी चाहिए। विद्वानों का मानना ​​है कि यह पूजा रात्रि में की जाती है।
ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि शिवपुराण के अनुसार इसी दिन भगवान शंकर के अंश से काल भैरव की उत्पत्ति हुई थी। क्रोध में आकर राक्षस अंधकासुर ने भगवान शिव पर आक्रमण कर दिया। उसे मारने के लिए भगवान शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। काल भैरव शिव का ही रूप हैं। इनकी पूजा करने से सभी दुखों और परेशानियों से मुक्ति मिल जाती है।

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भैरव अष्टमी शुभ मुहूर्त

ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि वैदिक पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 11 नवंबर को रात्रि 11:08 बजे प्रारंभ होगी. यह तिथि 12 नवंबर को रात 10 बजकर 58 मिनट पर समाप्त होगी. काल भैरव देव की पूजा निशा काल में की जाती है। इसलिए कालाष्टमी 12 नवंबर को मनाई जाएगी.

शिव-शक्ति की अष्टमी तिथि

भविष्यवक्ता डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि अष्टमी को काल भैरव प्रकट हुए थे। इसलिए इस तिथि को कालाष्टमी कहा जाता है। इस तिथि के स्वामी रुद्र हैं। साथ ही कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान शिव की पूजा करने की परंपरा है। साल भर अष्टमी तिथि पर पड़ने वाले सभी तीज-त्योहार देवी से जुड़े हुए हैं। इस तिथि पर शिव और शक्ति दोनों के प्रभाव के कारण भैरव पूजा और भी विशेष हो जाती है। इस तिथि पर भय को दूर करने वाले को भैरव कहा जाता है। इसलिए काल भैरव अष्टमी के दिन पूजा करने से नकारात्मकता, भय और अशांति दूर होती है।

रोग दूर हो जाते हैं

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि भैरव का अर्थ है भय को हरने वाला या भय को जीतने वाला। इसलिए काल भैरव के इस स्वरूप की पूजा करने से मृत्यु का भय और सभी प्रकार की परेशानियां दूर हो जाती हैं। नारद पुराण में कहा गया है कि काल भैरव की पूजा करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से किसी रोग से पीड़ित है तो वह रोग तथा अन्य प्रकार की परेशानियां दूर हो जाती हैं। देशभर में अलग-अलग नामों और अलग-अलग तरीकों से काल भैरव की पूजा की जाती है। काल भैरव भगवान शिव के प्रमुख गणों में से एक हैं।

ऊनी वस्त्रों का दान अत्यंत शुभ होता है

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि इस बार काल भैरव अष्टमी शनिवार को है। इसलिए अगहन माह होने के कारण इस पर्व पर दो रंग के कंबल का दान करना चाहिए। इससे शनिदेव के साथ-साथ भैरव भी प्रसन्न होंगे। साथ ही कुंडली में मौजूद राहु-केतु के अशुभ फलों में कमी आएगी। पुराणों में कहा गया है कि शीत ऋतु के कारण अगहन माह में ऊनी वस्त्रों का दान करना चाहिए। इससे भगवान विष्णु और लक्ष्मी की भी कृपा मिलती है।

शारीरिक और मानसिक परेशानियां दूर हो जाती हैं

भविष्यवक्ता डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि इस पर्व पर कुत्तों को जलेबी और इमरती खिलाने की परंपरा है। ऐसा करने से काल भैरव प्रसन्न होते हैं। इस दिन गाय को जौ और गुड़ खिलाने से राहु के कारण होने वाली परेशानियां खत्म होने लगती हैं। साथ ही इस दिन जरूरतमंद लोगों को सरसों का तेल, काले कपड़े, तले हुए खाद्य पदार्थ, घी, जूते-चप्पल, कांसे के बर्तन और उनसे जुड़ी कोई भी चीज दान करने से शारीरिक और मानसिक समस्याओं से राहत मिलती है। जाने-अनजाने में किए गए पाप भी खत्म हो जाते हैं।

रात्रि पूजा का विशेष महत्व है

कुंडली विश्लेषक डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि पुराणों के अनुसार काल भैरव की पूजा प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के समय या आधी रात के समय की जाती है। इस दिन रात्रि जागरण करके भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान कालभैरव की पूजा करने का महत्व है। काल भैरव के वाहन काले कुत्ते की भी पूजा की जाती है। कुत्ते को तरह-तरह के व्यंजन खिलाए जाते हैं। पूजा के दौरान काल भैरव की कथा भी सुनी या पढ़ी जाती है।

दर्द और डर दूर हो जाता है

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान काल भैरव की पूजा करने वाले का हर भय दूर हो जाता है। भगवान भैरव उसके सभी कष्ट हर लेते हैं। काल भैरव भगवान शिव का उग्र रूप हैं। शास्त्रों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति काल भैरव जयंती के दिन भगवान काल भैरव की पूजा करता है, तो उसे वांछित सिद्धियां प्राप्त होती हैं। भगवान काल भैरव को तंत्र का देवता भी माना जाता है।

कालभैरव जयंती का महत्व

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि भगवान कालभैरव की पूजा करने से साधक को भय से मुक्ति मिलती है। इनकी पूजा से ग्रह बाधा और शत्रु बाधा से मुक्ति मिलती है। भगवान कालभैरव के संबंध में शास्त्रों में बताया गया है कि भगवान कालभैरव का स्वरूप अच्छे कर्म करने वालों के लिए कल्याणकारी है और अनैतिक कार्य करने वालों के लिए वह दंड देने वाला है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो कोई भी भगवान भैरव के भक्तों को कष्ट देता है, उसे तीनों लोकों में कहीं भी आश्रय नहीं मिलता है।

इन मंत्रों के जाप से भयंकर से भयंकर संकटों से मुक्ति मिल जाएगी।

कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि श्री कालभैरव भगवान महादेव का अत्यंत उग्र, भयानक, वीभत्स, विकराल और रौद्र रूप हैं। श्री कालभैरव जयंती के दिन किसी भी शिव मंदिर में जाकर काल भैरव जी के इन मंत्रों में से किसी एक का जाप करने से गंभीर से गंभीर कष्ट नष्ट हो जाते हैं और मरने वाले व्यक्ति को भैरव बाबा की कृपा से जीवनदान मिलता है।

काल भैरव सिद्ध मंत्र

ॐ कालभैरवाय नमः।
ॐ भयहरणं च भैरव।
ॐ भ्रं कालभारवाय फट्।
ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं।
ॐ हं शं नं गं कं कं कं खं महाकाल भैरवाय नमः।

पूजा विधि

भविष्यवक्ता डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि अष्टमी तिथि पर सुबह स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लें। दीपक जलाएं और भगवान शिव की पूजा करें. भगवान कालभैरव की पूजा रात्रि में करने की परंपरा है। शाम के समय किसी मंदिर में जाएं और भगवान भैरव की मूर्ति के सामने चौमुखा दीपक जलाएं। – अब फूल, इमरती, जलेबी, उड़द, पान, नारियल आदि चढ़ाएं। इसके बाद उसी आसन पर बैठकर भगवान कालभैरव की चालीसा का पाठ करना चाहिए। पूजा समाप्त होने के बाद आरती करें और जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगें। प्रदोष काल या आधी रात के समय किसी जरूरतमंद को दो रंग का कंबल दान करें। इस दिन ॐ कालभैरवाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करें। पूजा के बाद भगवान भैरव को जलेबी या इमरती का भोग लगाएं। इस दिन अलग से इमरती बनाकर कुत्तों को खिलाएं।
– डॉ. अनिश व्यास
भविष्यवक्ता और कुंडली विश्लेषक

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