धर्म

माता पार्वती जयंती व्रत प्रेम, समर्पण और विश्वास का त्योहार है।

21 जुलाई को माता पार्वती जयंती व्रत है, सनातन धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। पार्वती जयंती के दिन भगवान महादेव की पत्नी माता पार्वती की विशेष रूप से पूजा की जाती है, तो आइए हम आपको माता पार्वती जयंती व्रत के महत्व और पूजा विधि के बारे में बताते हैं।

जानिए माता पार्वती जयंती व्रत के बारे में

सनातन धर्म में हर व्रत का विशेष महत्व होता है। जया पार्वती का व्रत आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। यह व्रत विवाहित महिलाओं और कुंवारी लड़कियों दोनों के लिए बहुत खास है। भगवान शिव और माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए यह कठिन व्रत 5 दिनों में पूरा किया जाता है। जया पार्वती व्रत के दिन माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा की जाती है।

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माता पार्वती जयंती व्रत का शुभ समय

हिंदू कैलेंडर के अनुसार, इस बार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 21 जुलाई 2026 को सुबह 4:02 बजे से शुरू हो रही है, जो कल 22 जुलाई 2026 को सुबह 5:16 बजे समाप्त होगी. ऐसे में इस बार पार्वती जयंती 21 जुलाई 2026, मंगलवार को मनाई जाएगी.

आषाढ़ शुक्ल अष्टमी तिथि का महत्व

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि यानी पार्वती जयंती के दिन को देवी पार्वती के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो शक्ति, भक्ति, प्रेम, सौंदर्य और मातृत्व (मां होने का एहसास) का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो लोग सच्चे मन से माता पार्वती की पूजा करते हैं, उन्हें जीवन की सभी समस्याओं से लड़ने की शक्ति मिलती है। साथ ही पापों का नाश होता है और वैवाहिक जीवन खुशियों से भरा रहता है।

माता पार्वती जयंती व्रत पर ऐसे करें पूजा, लाभ होगा

पंडितों के अनुसार माता पार्वती जयंती का व्रत बहुत खास होता है इसलिए पार्वती जयंती व्रत के दिन सुबह जल्दी उठें और स्नान आदि से निवृत होकर शुद्ध लाल या हरे रंग के कपड़े पहनें। घर के मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की एक साथ मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। व्रत का संकल्प लेने के बाद घी का दीपक जलाएं। देवी-देवताओं को जल, वस्त्र, अक्षत, हल्दी, फल और फूल चढ़ाएं। माता पार्वती को श्रृंगार का सामान चढ़ाने के बाद उनके समर्पित मंत्र ‘ओम नम: शिवायै च शिवायै च नमो नम:’ का 11 बार जाप करें। इसके बाद अपनी इच्छा व्यक्त करके पूजा समाप्त करें। पार्वती जयंती का व्रत अगले दिन अष्टमी तिथि की समाप्ति के बाद या मुख्य तिथि की शाम की पूजा के बाद तोड़ा जा सकता है।

इसीलिए माता पार्वती जयंती व्रत मनाया जाता है।

पार्वती जयंती देवी पार्वती के अवतरण (प्रकटीकरण) के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। वे प्रेम, भक्ति, शक्ति, मातृत्व और दिव्य स्त्री शक्ति के प्रतीक हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, वह भगवान शिव की शाश्वत साथी और सृजन, रखरखाव और परिवर्तन का स्रोत हैं। वैवाहिक सुख, पारिवारिक कल्याण, समृद्धि और आध्यात्मिक प्रगति के लिए प्रार्थना करने के लिए यह दिन बहुत शुभ माना जाता है।

माता पार्वती सिद्धि-विद्या देवी के नाम से भी प्रसिद्ध हैं।

शास्त्रों के अनुसार, माता पार्वती को व्यापक रूप से ‘जगदम्बा’ यानी ब्रह्मांड की माता के रूप में पूजा जाता है, लेकिन प्राचीन ग्रंथों में उन्हें बारह सिद्धि-विद्या देवी में से एक भी माना जाता है। तांत्रिक परंपराओं में, भक्त देवी के सिद्धि-विद्या रूपों के लिए विशेष अनुष्ठान करते हैं। पंडितों के अनुसार, अनुशासित पूजा और ध्यान के माध्यम से की गई ये प्रथाएं भक्तों को उनकी सच्ची इच्छाओं को पूरा करने, बाधाओं को दूर करने और आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ने में मदद करती हैं।

माता पार्वती जयंती व्रत का महत्व

पंडितों के अनुसार माता पार्वती शक्ति, भक्ति, समर्पण और अखंड सौभाग्य की देवी मानी जाती हैं। धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से इस दिन का विशेष महत्व है। माता पार्वती प्रकृति और शक्ति का स्वरूप हैं। इनकी पूजा करने से जीवन से नकारात्मक ऊर्जा खत्म हो जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत रखने और माता पार्वती की पूजा करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है और वैवाहिक जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। यह दिन सौभाग्य और वैवाहिक सुख लेकर आता है। अगर अविवाहित लड़कियां सच्चे मन से यह व्रत करती हैं तो उन्हें योग्य और मनचाहा जीवनसाथी मिलता है या मनचाहा वर मिलता है।

माता पार्वती जयंती व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी रोचक है।

पौराणिक कथा के अनुसार माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान सहन न कर पाने के कारण योगाग्नि द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दिया था। इसके बाद उन्होंने हिमालय राजा हिमवान और माता मैना के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। माता पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को अपना पति मानती थीं। महर्षि नारद ने उनसे कहा कि शिव को पति के रूप में पाने के लिए उन्हें कठोर तपस्या करनी होगी। नारद जी के मार्गदर्शन पर माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की। उन्होंने जल, भोजन और यहाँ तक कि पत्ते खाना भी त्याग दिया, जिसके कारण उन्हें ‘अपर्णा’ भी कहा गया।
उनकी अटूट भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसके बाद शिव और पार्वती का दिव्य विवाह हुआ। यही कारण है कि पार्वती जयंती को अटूट वैवाहिक प्रेम और सौभाग्य का पर्व माना जाता है। पार्वती जयंती न केवल देवी पार्वती के जन्मोत्सव का पर्व है, बल्कि यह प्रेम, तपस्या, समर्पण और अटूट विश्वास का संदेश भी देता है। माना जाता है कि इस दिन देवी पार्वती और भगवान शिव की भक्ति और विधि-विधान से पूजा करने से वैवाहिक जीवन में खुशहाली, परिवार में समृद्धि और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है। इसलिए इस शुभ अवसर पर पूरी श्रद्धा से पूजा करें और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त करें।

माता पार्वती जयंती व्रत से जुड़ी पौराणिक मान्यताएँ

पंडितों के अनुसार, इस दिन विवाहित महिलाएं माता पार्वती को सुहाग का सामान चढ़ाने की विशेष मान्यता रखती हैं, जिसमें लाल चूड़ियां, लाल जोड़ा, सिन्दूर, बिंदी, मेहंदी और आलता शामिल हैं। इसके बाद यह सामग्री किसी ब्राह्मण महिला या जरूरतमंद महिला को दान कर दी जाती है। इस पवित्र दिन पर गौरी-शंकर की संयुक्त पूजा की जाती है, इस प्रकार की पूजा से शुभ फल मिलता है।
-प्रज्ञा पांडे

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