धर्म

बोधगया से श्रीलंका तक मनाया गया ‘वेसाक’, जानिए दुनिया कैसे मना रही है भगवान बुद्ध का उत्सव

वैशाखी पूर्णिमा अत्यंत पवित्र तिथि है। इस दिन दान-धर्म के कई कार्य किये जाते हैं। वैशाख पूर्णिमा के दिन ही बुद्ध पूर्णिमा भी मनाई जाती है। इसी दिन भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग इस दिन को बहुत धूमधाम से मनाते हैं। हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए बुद्ध विष्णु के नौवें अवतार हैं। इसलिए यह दिन हिंदुओं के लिए भी पवित्र माना जाता है। इसे ‘सत्य विनायक पूर्णिमा’ भी माना जाता है। जब भगवान श्री कृष्ण के बचपन के मित्र सुदामा, एक गरीब ब्राह्मण, उनसे मिलने द्वारका आए, तो श्री कृष्ण ने उन्हें सत्यविनायक व्रत की विधि बताई। इस व्रत के प्रभाव से सुदामा की सारी दरिद्रता दूर हो गई और वह सुख-ऐश्वर्य से परिपूर्ण हो गया।

इस दिन कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। हर देश में इसे स्थानीय परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है, जैसे श्रीलंका में इसे वेसाक कहा जाता है। इस दिन अहिंसा और नैतिकता अपनाने का संकल्प लिया जाता है। इस दिन मांसाहारी भोजन का भी सेवन नहीं किया जाता, क्योंकि महात्मा बुद्ध किसी भी प्रकार की हिंसा के खिलाफ थे। चीन, तिब्बत और दुनिया के कई अन्य कोनों में फैले बौद्ध धर्म के अनुयायी इसे अपने-अपने तरीके से मनाते हैं। बिहार में स्थित बोधगया नामक स्थान हिंदू और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए एक पवित्र तीर्थ स्थान है। घर छोड़ने के बाद सिद्धार्थ सात वर्षों तक वन में भटकते रहे। यहां उन्होंने कठोर तपस्या की और अंततः वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। तभी से इस दिन को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।

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इस दिन बौद्ध घरों में दीपक जलाए जाते हैं और घरों को फूलों से सजाया जाता है। इस त्योहार पर दुनिया भर से बौद्ध धर्म के अनुयायी बोधगया आते हैं और प्रार्थना करते हैं। इस दिन बोधि वृक्ष की पूजा की जाती है। इसकी शाखाओं पर मालाएँ और रंग-बिरंगे झंडे सजाए जाते हैं। जड़ों पर दूध और सुगंधित पानी डाला जाता है और पेड़ के चारों ओर दीपक जलाए जाते हैं। इस दिन पक्षियों को पिंजरे से मुक्त कर खुले आसमान में छोड़ दिया जाता है और गरीबों को भोजन और कपड़े दान किये जाते हैं। दिल्ली संग्रहालय इस दिन बुद्ध की अस्थियाँ निकालता है ताकि बौद्ध अनुयायी वहाँ आकर प्रार्थना कर सकें।

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इस दिन अलग-अलग पुण्य कार्य करने से अलग-अलग फल मिलता है। धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि इस दिन धर्मराज के लिए जल से भरा घड़ा और थाल दान करने से गाय दान करने के समान फल मिलता है। साथ ही पांच या सात ब्राह्मणों को चीनी के साथ तिल का दान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन यदि तिल के जल से स्नान करके घी, चीनी और तिल से भरा पात्र भगवान विष्णु को चढ़ाया जाए और उन्हें अग्नि में समर्पित किया जाए, या तिल और शहद का दान किया जाए, तिल के तेल का दीपक जलाया जाए, जल और तिल का भोग लगाया जाए या गंगा आदि में स्नान किया जाए तो व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है। यदि इस दिन एक समय भोजन करने के बाद पूर्णिमा, चंद्रमा अथवा भगवान सत्यनारायण का व्रत किया जाए तो उसे सभी प्रकार के सुख, धन तथा श्रेय की प्राप्ति होती है।

-शुभा दुबे

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