धर्म

महावीर जयंती 2026: भगवान महावीर के पवित्र शब्द युगों-युगों तक हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे।

‘अहिंसा परमो धर्म’ का अमर संदेश देने वाले भगवान महावीर का जीवन और दर्शन आज के अशांत, तनावपूर्ण और संघर्षपूर्ण समय में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। आधुनिक युग में मनुष्य प्रगति की अंधी दौड़ में नैतिक मूल्यों से दूर होता जा रहा है। स्वार्थ, लालच और प्रतिस्पर्धा ने उसे इस हद तक प्रभावित कर दिया है कि वह अपने फायदे के लिए हिंसा और अनैतिकता को भी उचित ठहराने लगा है। ऐसे समय में महावीर स्वामी का अहिंसा, संयम और करुणा पर आधारित दर्शन मानवता को नई दिशा देता है और आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।

भगवान महावीर ने अपने जीवन से यह स्पष्ट कर दिया कि प्रत्येक प्राणी एक समान है और प्रत्येक प्राणी में एक आत्मा है। उनके द्वारा दिया गया ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत केवल एक नैतिक उपदेश नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन दर्शन है। यह हमें अपने व्यवहार और आचरण में ऐसी संवेदनशीलता विकसित करना सिखाता है जिससे किसी भी प्राणी को नुकसान न पहुंचे। उनका यह विचार कि पेड़-पौधे, पानी, हवा और यहां तक ​​कि आग में भी जीवन है, आज के पर्यावरणीय संकट के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। जब पृथ्वी प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के संकट से जूझ रही है, महावीर का यह संदेश हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील होने का आह्वान करता है।

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महावीर स्वामी ने कर्म के सिद्धांत को भी बहुत स्पष्टता से समझाया। उनका मानना ​​था कि मनुष्य अपने कार्यों के लिए स्वयं जिम्मेदार है और वे ही उसका भविष्य निर्धारित करते हैं। कोई भी व्यक्ति अपने कर्मों से बच नहीं सकता. जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। यह सिद्धांत न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक और नैतिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मनुष्य को जिम्मेदारी और जागरूकता का बोध कराता है। उन्होंने यह भी सिखाया कि धर्म बाहरी आडंबर में नहीं बल्कि आत्मा की पवित्रता में निहित है। अहिंसा, सत्य, संयम और तपस्या ही धर्म के वास्तविक लक्षण हैं। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे अवगुण मनुष्य के सभी गुणों को नष्ट कर देते हैं। इसलिए जो व्यक्ति अपने जीवन में शांति और संतुलन चाहता है उसे इन विकारों का त्याग कर देना चाहिए। महावीर का यह संदेश आज के तनावपूर्ण जीवन में अत्यंत उपयोगी है, जहां मानसिक अशांति और असंतुलन तेजी से बढ़ रहा है।

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महावीर स्वामी ने समानता और मानवता का भी अनोखा संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति जन्म से नहीं बल्कि कर्म से महान बनता है। यदि कोई उच्च कुल में जन्म लेकर भी बुरे कर्म करता है तो वह महान नहीं हो सकता, वहीं यदि निम्न कुल में जन्मा व्यक्ति अच्छा आचरण और अच्छे विचार अपनाता है तो वह सम्मान का पात्र होता है। यह विचार सामाजिक समरसता एवं समानता की नींव को मजबूत करता है। उनकी दृष्टि में सेवा भी सर्वोच्च धर्म है। उन्होंने बीमारों और जरूरतमंदों की सेवा को ईश्वर की सेवा से भी बड़ा बताया। उन्होंने यह भी कहा कि पुरुष और महिला दोनों समान रूप से मुक्ति के हकदार हैं, जो उनके प्रगतिशील और समतावादी विचारों को दर्शाता है।

आज जब समाज हिंसा, असहिष्णुता और नैतिक पतन की चुनौतियों से जूझ रहा है, भगवान महावीर की अमृतवाणी हमें आत्मशुद्धि, सह-अस्तित्व और शांति का मार्ग दिखाती है। यदि हम उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में आत्मसात कर लें तो न केवल व्यक्तिगत जीवन में संतुलन और शांति स्थापित हो सकती है, बल्कि समाज में सद्भाव, करुणा और अहिंसा की स्थापना भी संभव है। यही महावीर स्वामी के संदेश का वास्तविक महत्व है, जो युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा।

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-योगेश कुमार गोयल

(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं और ‘फ्रॉम सी टू स्पेस: इंडियाज डिफेंस रिवोल्यूशन’ पुस्तक के लेखक हैं)

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