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विनाशकारी ईरान-अमेरिका युद्ध: ट्रम्प का खतरनाक कदम और पश्चिम एशिया में भड़कती अराजकता

ईरान-अमेरिका युद्ध की शुरुआत के ठीक छह दिन बाद, पूरा पश्चिम एशिया एक अभूतपूर्व और विनाशकारी अराजकता में डूब गया है। जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यह खतरनाक युद्ध शुरू किया, जिसके तहत ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई, शीर्ष कमांडरों और कम से कम 160 मासूम स्कूली बच्चों की जान गई, तो वाशिंगटन की रणनीति ईरानियों को विद्रोह के लिए उकसाने की थी। हालांकि, ज़मीनी हकीकत अमेरिकी उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत साबित हुई है। ईरान में इस्लामिक गणराज्य के पतन के बजाय, एक पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध भड़क चुका है।

ईरान-अमेरिका युद्ध का पहला हफ्ता: उम्मीद के विपरीत नतीजे और बढ़ता तनाव

ईरान ने बिना किसी देरी के जवाबी कार्रवाई करते हुए इज़राइल के साथ-साथ फारस की खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों, संपत्तियों और कूटनीतिक मिशनों को निशाना बनाया है। इस युद्ध ने अब एक बहु-आयामी रूप ले लिया है।

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हालिया उपग्रह छवि-आधारित (Satellite Imagery) विश्लेषण से इस बात के पुख्ता सबूत मिलते हैं कि ईरान ने कम से कम सात अमेरिकी सैन्य स्थलों के रडार और संचार बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुँचाया है। इसके साथ ही, कई अन्य मोर्चों पर भी युद्ध तेज हो गया है:

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हिंद महासागर तक फैला ईरान-अमेरिका युद्ध: आईआरआईएस देना (IRIS Dena) का विनाश

4 मार्च को, इस ईरान-अमेरिका युद्ध ने भारत के दरवाजे पर दस्तक दे दी। संयुक्त राज्य अमेरिका ने श्रीलंका के तट के करीब हिंद महासागर में एक ईरानी युद्धपोत, ‘आईआरआईएस देना’ को टॉरपीडो से उड़ाकर अपने युद्ध क्षेत्र का खतरनाक विस्तार किया।

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इस हमले में कम से कम 83 ईरानी नाविक मारे गए। विडंबना यह है कि यह जहाज अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू के लिए पिछले सप्ताह ही भारत के विशाखापत्तनम में मौजूद था। यदि राष्ट्रपति ट्रम्प और उनके इजरायली सहयोगी बेंजामिन नेतन्याहू का यह आकलन था कि खामेनेई की हत्या से ईरान रातों-रात ढह जाएगा, तो उनका यह अनुमान पूरी तरह गलत साबित हुआ है।

ईरान-अमेरिका युद्ध में बिना ‘एग्जिट प्लान’ के फंसे ट्रम्प?

वर्तमान स्थिति स्पष्ट रूप से दिखाती है कि किसी भी पक्ष में पीछे हटने की इच्छा नहीं है। अमेरिकी युद्ध सचिव पीट हेगसेथ ने बुधवार को स्वीकार किया कि यह संघर्ष कम से कम आठ सप्ताह तक खिंच सकता है। वहीं, ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली लारिजानी ने अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार की बातचीत की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया है।

अमेरिकी मीडिया की लीक हुई रिपोर्ट्स के मुताबिक, वाशिंगटन अब ईरान के भीतर आंतरिक अशांति को बढ़ावा देने के लिए उत्तर-पश्चिम ईरान में जातीय कुर्द लड़ाकों को हथियार देने की रणनीति पर विचार कर रहा है।

युद्ध के मुख्य मोर्चेशामिल पक्षवर्तमान स्थिति
फारस की खाड़ीअमेरिका बनाम ईरानअमेरिकी रडार साइट्स क्षतिग्रस्त
उत्तरी इज़राइलइज़राइल बनाम हिज़बुल्लाहभारी रॉकेट हमले जारी
हिंद महासागरअमेरिका बनाम ईरानी नौसेनाईरानी युद्धपोत नष्ट, 83 नाविक मृत
इराक/सीरियाअमेरिकी बल बनाम प्रो-ईरान मिलिशियाअमेरिकी ठिकानों पर लगातार हमले

यह एक बेहद खतरनाक गेम है। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि श्री ट्रम्प ने बिना किसी ठोस “निकास रणनीति” (Exit Strategy) के यह युद्ध छेड़ दिया है। चूंकि ईरानी राज्य के भीतर बगावत के कोई संकेत नहीं हैं, इसलिए अमेरिका अब बड़े पैमाने पर बमबारी और नागरिक संघर्ष को भड़काने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

भारत के लिए ईरान-अमेरिका युद्ध का क्या अर्थ है?

इस ईरान-अमेरिका युद्ध का भारत पर सीधा और गंभीर प्रभाव पड़ना तय है।

  1. आर्थिक संकट: कच्चे तेल और गैस की वैश्विक कीमतों में भारी उछाल आना तय है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था पर एक बड़ा बोझ डालेगा और महंगाई बढ़ाएगा।

  2. प्रवासियों की सुरक्षा: पश्चिम एशिया (खाड़ी देशों) में लाखों भारतीय रहते और काम करते हैं। एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध उनकी आर्थिक और भौतिक सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है।

  3. कूटनीतिक चुनौती: नई दिल्ली ने शुरुआत में एक मित्र देश के नेता (खामेनेई) की हत्या की कड़ी निंदा नहीं की थी। हालांकि, अब भारत को इस युद्ध के खिलाफ एक मजबूत और स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।

भारत को अन्य वैश्विक शक्तियों के साथ मिलकर संघर्ष को कम करने (De-escalation) के लिए काम करना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत को अपने ‘पिछवाड़े’ यानी हिंद महासागर में इस युद्ध को लाने के अमेरिकी प्रयासों का सख्ती से और कूटनीतिक स्तर पर विरोध करना चाहिए।

 

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