धर्म

Guru Purnima 2026: जानिए आषाढ़ पूर्णिमा पर गुरु पूजा का महत्व

यह आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है जिसमें गुरु की पूजा करने की परंपरा है। यह त्यौहार पूरे भारत में बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन हमें अपने गुरुजनों के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित कर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए। इस दिन सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर ब्राह्मणों के साथ ‘गुरु परंपरा सिद्धयर्थं व्यास पूजा करिष्ये’ का संकल्प लेकर श्रीपर्गी वृक्ष की चौकी पर उसी धातु का कपड़ा बिछाकर प्राग (पूर्व से पश्चिम) और उदग (उत्तर से दक्षिण) पर गंध आदि से बारह रेखाएं बनाएं और व्यास पीठ को स्थापित कर दसों दिशाओं में अक्षुण्ण छोड़ दें और दिग्बंधन करें। इसके बाद ब्रह्मा, ब्रह्म परवर शक्ति, व्यास, शुकदेव, गौड़पाद, गोविंद स्वामी और शंकराचार्य आदि के नामों का मंत्रों से आह्वान करके अपने दीक्षा गुरु (माता, पिता, दादा, भाई आदि) की भगवान की तरह पूजा करें।

प्राचीन काल में जब कोई विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करता था तो इस दिन भक्ति से प्रेरित होकर अपने गुरु की पूजा करता था तथा अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुसार उन्हें दक्षिणा देता था। परिवार में जो भी आपसे बड़ा हो उसे अपना गुरु मानना ​​चाहिए। जैसे माता, पिता, बड़े भाई, बड़ी बहन आदि। इस दिन स्नान और पूजा करने के बाद अच्छे कपड़े पहनने चाहिए और गुरु को वस्त्र, फल, फूल और माला चढ़ाकर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए। गुरु का आशीर्वाद ही प्राणियों के लिए कल्याणकारी एवं मंगलकारी होता है।

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कहा जाता है कि इस दिन से साधु-संत चार महीने तक एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा फैलाते हैं। ये चार महीने मौसम के लिहाज से सबसे अच्छे होते हैं। न ज्यादा गरम न ज्यादा ठंडा. इसलिए इसे अध्ययन के लिए उपयुक्त माना जाता है। यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वह संस्कृत के महान विद्वान थे और वेदों का सार ब्रह्म सूत्र की रचना भी इसी दिन वेद व्यास ने की थी। वेद व्यास ने ही वेदों का संकलन कर उन्हें चार भागों में विभाजित किया था। उन्होंने ही महाभारत, 18 पुराण और 18 उपपुराणों की रचना की, जिसमें भागवत पुराण जैसा अतुलनीय ग्रंथ भी शामिल है। ऐसे जगत गुरु के जन्मदिन पर गुरु पूर्णिमा मनाने की परंपरा है।

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प्राचीन काल से चले आ रहे इस पर्व का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। परंपरागत रूप से शिक्षा प्रदान करने वाले स्कूलों में यह दिन शिक्षक को सम्मान देने का होता है। इस दिन मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होता है, जगह-जगह भंडारे और मेलों का आयोजन किया जाता है। इस दिन छात्रों को अपने गुरु को वस्त्र, फल, फूल और माला चढ़ाकर प्रसन्न करना चाहिए और उनका आशीर्वाद लेना चाहिए। इस दिन न केवल गुरु बल्कि माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा करने की परंपरा है।

– शुभा दुबे

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