धर्म

पुरी में भगवान जगन्नाथ रथयात्रा का दिव्य आरंभ, 100 यज्ञों का पुण्य फल और मोक्ष की अद्भुत परंपरा

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को उड़ीसा के पुरी और गुजरात के द्वारका पुरी नामक स्थान पर भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा बड़ी धूमधाम से निकाली जाती है। इस उत्सव के दौरान भक्तों की भक्ति देखते ही बनती है क्योंकि जिस रथ पर भगवान सवार होते हैं उसे घोड़े या अन्य जानवर नहीं बल्कि भक्त स्वयं खींचते हैं। पुरी में श्री जगदीश भगवान को उनके परिवार सहित एक विशाल रथ पर बैठाकर भ्रमण कराया जाता है और वापस आकर उसी स्थान पर स्थापित कर दिया जाता है। यह त्यौहार अनोखा है. इस अवसर पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां जुटते हैं।
भगवत भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और उत्सव मनाते हैं। पुरी में भगवान जिस रथ पर सवार होते हैं वह विशाल और अनोखा है। यह 45 फीट ऊंचा, 35 फीट लंबा और इतनी ही चौड़ाई का है। इसमें सात फीट व्यास के 16 पहिये हैं। इसी प्रकार बलभद्र जी का रथ 44 फीट ऊंचा होता है, इसमें 12 पहिये होते हैं और सुभद्रा जी का रथ 43 फीट ऊंचा होता है। उनके रथ में भी 12 पहिये होते हैं। हर वर्ष नये रथ बनाये जाते हैं। मंदिर के सिंह द्वार पर बैठकर भगवान जनकपुरी की ओर रथयात्रा करते हैं। जनकपुरी में तीन दिन का विश्राम है जहां उनकी मुलाकात श्री लक्ष्मीजी से होती है। इसके बाद भगवान श्रीजगन्नाथ पुनः पुरी लौट आते हैं और स्थिर हो जाते हैं।

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दस दिनों तक चलने वाली यह रथ यात्रा भारत में मनाये जाने वाले धार्मिक त्योहारों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। भगवान श्रीकृष्ण के अवतार ‘जगन्नाथ’ की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना जाता है। यात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण के साथ शुरू होती है। भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘गरुड़ध्वज’ या ‘कपिलध्वज’ कहा जाता है। रथ पर लगे ध्वज को ‘त्रैलोक्यमोहिनी’ या ‘नंदीघोष’ रथ कहा जाता है। बलराम जी के रथ को ‘तालध्वज’ नाम से जाना जाता है। रथ के झंडे को ‘यूनानी’ कहा जाता है। जिस रस्सी से रथ खींचा जाता है उसे ‘वासुकि’ कहते हैं। सुभद्रा के रथ को ‘पद्मध्वज’ कहा जाता है। रथ के ध्वज को ‘नन्दम्बिक’ कहा जाता है। इसे खींचने के लिए जिस रस्सी का प्रयोग किया जाता है उसे ‘स्वर्णचूड़ा’ कहा जाता है।
रथ यात्रा शुरू होने से पहले पुराने राजाओं के वंशज परंपरागत रूप से सोने के हैंडल वाली झाड़ू से ठाकुर जी के प्रस्थान पथ को साफ करते हैं। इसके बाद मंत्रोच्चार और जयकारे के साथ रथयात्रा शुरू होती है। सबसे पहले बलभद्र का रथ तालध्वज से निकलता है। कुछ समय बाद सुभद्रा की यात्रा प्रारम्भ होती है। अंत में लोग बड़ी श्रद्धा से भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचते हैं। लोगों का मानना ​​है कि रथयात्रा में सहयोग करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, इसलिए सभी भक्त कुछ क्षण के लिए रथ खींचने के लिए उत्सुक रहते हैं। जगन्नाथ जी की यह रथ यात्रा गुंडिचा मंदिर पहुंचकर समाप्त होती है। ‘गुंडिचा मंदिर’ उसी स्थान पर स्थित है जहां पर विश्वकर्मा जी ने तीन देवताओं की मूर्तियों का निर्माण किया था। इसे भगवान की मौसी का घर भी माना जाता है। भगवान यहां एक सप्ताह तक रहते हैं और इस दौरान यहां उनकी पूजा की जाती है। आषाढ़ शुक्ल दशमी को जगन्नाथ जी की वापसी यात्रा प्रारम्भ होती है। रथ शाम तक जगन्नाथ मंदिर पहुंचते हैं लेकिन अगले ही दिन मंत्रोच्चार के साथ मूर्तियों को मंदिर के गर्भगृह में पुनः स्थापित कर दिया जाता है।
– शुभा दुबे

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