धर्म

जगन्नाथ रथ यात्रा: 42 पहिए, धातु का इस्तेमाल नहीं, कैसे बनते हैं ये 3 भव्य रथ?

भारत व्रत, त्यौहार और संस्कृतियों से मिलकर बना है। यहां का हर त्योहार अपनी एक खास खासियत रखता है। विविधताओं से भरे भारत में कई त्यौहार हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते हैं। इसी तरह ओडिशा के पुरी में हर साल आयोजित होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा को दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव माना जाता है।
इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भव्य रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं। दरअसल, रथयात्रा का मुख्य आकर्षण केवल देवताओं के दर्शन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इन विशाल रथों का निर्माण और उनकी अनूठी डिजाइन भी लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र मानी जाती है। दरअसल, हर साल इन तीनों रथों का नए सिरे से निर्माण किया जाता है। आइए आपको रथ यात्रा के तीनों रथों की अनोखी संरचना के बारे में विस्तार से बताते हैं।
जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए रथ का निर्माण कब शुरू होता है?
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के लिए रथों का निर्माण कार्य अक्षय तृतीया से शुरू होता है, जिसे सनातन परंपरा में बहुत शुभ दिन माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस शुभ तिथि पर शुरू किए गए काम में सफलता और समृद्धि आती है। यही कारण है कि इस दिन रथ निर्माण का आरंभ किया जाता है। इस शुभ अवसर पर वैदिक मंत्रोच्चार, पूजा-अर्चना और हवन के साथ रथ निर्माण की शुरुआत की जाती है.
फिर मंदिर के पुजारी पूजा करते हैं और मुख्य कारीगरों को मालाएं चढ़ाते हैं। इसके बाद तीनों रथों का निर्माण एक साथ शुरू किया जाता है और लगभग एक ही समय में पूरा भी किया जाता है। इन तीनों रथों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसके पहिए हैं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के तीन रथों के लिए कुल 42 पहिए बनाए जाते हैं। इन पहियों को तैयार करने के बाद इन्हें रथ के मुख्य ढांचे में लगाया जाता है।
रथों को विभिन्न प्रकार से सजाया गया था
इन रथों की सजावट बहुत अलग-अलग होती है। दरअसल, जगन्नाथ रथयात्रा के रथों की सुंदरता उनकी कलात्मक सजावट में छिपी होती है। रथों पर नक्काशी ओडिशा के पारंपरिक मंदिर वास्तुकला से प्रेरित है। रथों की लकड़ी पर उकेरे गए डिज़ाइन और रंगीन पेंटिंग इन रथों को भव्य रूप देते हैं। रंथा के ऊपर रखी विशाल कपड़े की छतरियों को लाल, पीले, हरे और काले रंगों से सजाया गया है। इन कपड़ों पर पारंपरिक कढ़ाई की जाती है, जो रथों की सुंदरता को और बढ़ा देती है।
नंदीघोष- भगवान जगन्नाथ का रथ
भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष के नाम से प्रसिद्ध है। यह तीनों रथों में सबसे भव्य माना जाता है और इसकी ऊंचाई लगभग 45 फीट है। यह विशाल रथ 16 बड़े पहियों से सुसज्जित है। रथ पर मुख्य रूप से लाल और पीले रंग का आकर्षक संयोजन देखने को मिलता है। वहीं, इसे ले जाने वाले घोड़ों का रंग सफेद होता है, जो पवित्रता और दिव्यता का प्रतीक माना जाता है।
लाल झंडा- भगवान बलभद्र का रथ
भगवान बलभद्र के रथ को तालध्वज कहा जाता है। इसकी ऊंचाई भी करीब 45 फीट है और इसमें 14 पहिये हैं. इस रथ को लाल और हरे रंग से सजाया गया है. इसके घोड़े काले रंग के होते हैं।
दर्पदलन- देवी सुभद्रा का रथ
देवी सुभद्रा का रथ दर्पदलन या देबादलन में बदल जाता है। इसकी ऊंचाई करीब 44 फीट 6 इंच है. वहीं, इसमें 12 पहिए हैं। रथ का मुख्य रंग लाल और काला है। इसे खींचने वाले घोड़े का रंग लाल होता है।
रथ बिना कीलों के बनाया जाता है
इन रथों की सबसे खास बात यह है कि इनमें किसी भी धातु का उपयोग नहीं किया जाता है बल्कि इनमें केवल लड़कियों का उपयोग किया जाता है। इसके निर्माण में लकड़ी के हिस्सों को आपस में जोड़ने के लिए खांचे और लकड़ी के खूंटों का उपयोग किया जाता है। जिससे इसकी संरचना और भी खूबसूरत हो जाती है.

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