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धर्म

छठ पूजा 2025: सूर्य उपासना का महापर्व छठ: लोक आस्था का अद्भुत संगम, मिलता है छठी मैया का आशीर्वाद

छठ पर्व भारतीय संस्कृति के उन दुर्लभ त्योहारों में से एक है, जिसमें लोक आस्था, प्रकृति और पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह त्यौहार मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है, लेकिन आज इसकी महिमा पूरे भारत और विदेशों तक फैल गई है।

छठ पर्व सूर्य उपासना का पर्व है। इस दिन भक्त भगवान सूर्य और उनकी पत्नी उषा (छठी मैया) की पूजा करते हैं। वैदिक परंपरा में, सूर्य को जीवन देने वाली ऊर्जा का स्रोत माना जाता है – जो न केवल पृथ्वी को प्रकाश और गर्मी प्रदान करता है, बल्कि सभी जीवित प्राणियों के जीवन में चेतना का संचार भी करता है। छठ का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है; कहा जाता है कि अयोध्या लौटने के बाद श्री राम और सीता जी ने इसी प्रकार सूर्य देव की पूजा की थी। छठ पर्व चार दिनों तक मनाया जाता है. पहले दिन नहाय-खाय के तहत व्रती पवित्र स्नान कर पवित्रता के साथ भोजन ग्रहण करते हैं. दूसरे दिन खरना करना होता है. इसके तहत निर्जला व्रत रखा जाता है और शाम को गुड़-चावल की खीर और रोटी का प्रसाद बनाकर सूर्य को अर्पित किया जाता है. तीसरे दिन संध्या अर्घ्य दिया जाता है. डूबते सूर्य को नदी, तालाब या घाट पर अर्घ्य दिया जाता है। चौथे दिन सुबह अर्घ्य दिया जाता है. यानी उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत समाप्त होता है।

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छठ पर्व के दौरान व्रती काफी सख्त नियमों का पालन करते हैं। जैसे जमीन पर सोना, बिना नमक का भोजन करना, पूर्ण पवित्रता और संयम। छठ पर्व सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मानव और प्रकृति के सह-अस्तित्व का प्रतीक है। इसमें सूर्य, जल और मिट्टी की पूजा के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश है। इसके अलावा, इसमें कोई भेदभाव नहीं है – पुरुष और महिलाएं, जाति, वर्ग या धर्म सभी एक साथ घाट पर इकट्ठा होते हैं और सूर्य को अर्घ्य देते हैं। यह सामाजिक समरसता एवं सामूहिकता का अनूठा उदाहरण है।

आधुनिक समय में छठ का महत्व

आज जब जीवन की आपाधापी में मनुष्य प्रकृति और अपनी जड़ों से दूर होता जा रहा है, छठ पर्व हमें सादगी, अनुशासन और संयम का पाठ पढ़ाता है। यह त्यौहार हमें यह भी याद दिलाता है कि हमारी संस्कृति में हर त्यौहार सिर्फ एक उत्सव नहीं बल्कि जीवन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। छठ पर्व भारतीय लोक जीवन का वह उज्ज्वल अध्याय है जिसमें आस्था, परंपरा और पर्यावरण का अद्भुत संगम है। यह न केवल सूर्य देव की पूजा है, बल्कि उस समग्र जीवन शक्ति का उत्सव है जो हम सभी को जोड़ती है।

ऐसा माना जाता है कि इस त्यौहार की शुरुआत द्वापर काल में हुई थी। बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थापित प्राचीन सूर्य मंदिर में छठ पर्व के दौरान वृद्ध सूर्य मेले का आयोजन किया जाता है। इस व्रत में सूर्य पुत्र अंगराज कर्ण को विशेष रूप से याद किया जाता है, जो सूर्य के बहुत बड़े उपासक थे और नदी के पानी में खड़े होकर भगवान सूर्य की पूजा किया करते थे। पूजा के बाद कर्ण कभी भी किसी भिखारी को खाली हाथ नहीं लौटाते थे।

यह त्यौहार मुख्य रूप से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ-साथ नेपाल के कुछ इलाकों में भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन अब इस त्यौहार का विस्तार देश के अन्य हिस्सों में भी हो गया है। दिल्ली में यमुना नदी और इंडिया गेट तथा मुंबई में चौपाटी पर उमड़ रही छठ व्रतियों की भीड़ यह साबित करती है कि बड़े शहरों में भी इस पर्व को लेकर जागरूकता बढ़ी है.

छठ व्रत कथा

राजा प्रियवद के कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया और यज्ञ में बनाई गई खीर उनकी पत्नी मालिनी को दी। इसके प्रभाव से उन्हें एक पुत्र उत्पन्न हुआ लेकिन वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद अपने पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी समय भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और बोलीं कि मैं सृष्टि की मूल प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण षष्ठी कहलाती हूं। राजन, तुम मेरी पूजा करो और अन्य लोगों को भी प्रेरणा दो। राजा ने पुत्र की कामना से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को की गई थी।

शुभा दुबे

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