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जम्मू-कश्मीर क्रिकेट टीम का रणजी ट्रॉफी फाइनल में महामुकाबला और बिशन सिंह बेदी का सपना

जम्मू-कश्मीर क्रिकेट टीम का रणजी ट्रॉफी फाइनल में महामुकाबला और बिशन सिंह बेदी का सपना
जम्मू-कश्मीर क्रिकेट टीम का रणजी ट्रॉफी फाइनल में महामुकाबला और बिशन सिंह बेदी का सपना

जम्मू-कश्मीर के पूर्व रणजी ट्रॉफी कोच बिशन सिंह बेदी, उत्तरी क्षेत्र में क्रिकेट के विकास में एक प्रेरणादायक व्यक्ति थे। फ़ाइल | फोटो साभार: द हिंदू

अविश्वसनीय इतिहास: रणजी फाइनल का असर क्रिकेट से परे जम्मू-कश्मीर में भी महसूस किया जाएगा

जम्मू-कश्मीर क्रिकेट टीम ने इस बार अपने शानदार और अविश्वसनीय प्रदर्शन से पूरे देश को हैरान कर दिया है। आज जब यह अंडरडॉग टीम रणजी ट्रॉफी का फाइनल मुकाबला खेल रही है, तो यकीनन क्रिकेट जगत के महान दिग्गज और पूर्व कोच स्वर्गीय बिशन सिंह बेदी जहाँ भी होंगे, उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया होगा। काश! वह इस स्वर्णिम पल को अपनी आँखों से देखने के लिए आज हमारे बीच जीवित होते। हालांकि, उन्हें इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ होगा, क्योंकि एक दशक से भी अधिक समय पहले उन्होंने यह भविष्यवाणी कर दी थी कि यह टीम एक दिन क्रिकेट की स्थापित और मजबूत टीमों को चौंकाने के लिए पूरी तरह तैयार हो रही है।

बिशन सिंह बेदी: वह दूरदर्शी गुरु जिसने बोए आत्मविश्वास के बीज

साल 2011 में जब बिशन सिंह बेदी को जम्मू-कश्मीर क्रिकेट टीम का मुख्य कोच नियुक्त किया गया था, तब उन्होंने टीम की सबसे बड़ी कमजोरी को तुरंत भांप लिया था। उन्होंने देखा कि घाटी के युवाओं में क्रिकेट की प्रतिभा तो भरपूर है, लेकिन उनमें आत्मविश्वास की भारी कमी है। उनकी मानसिकता सिर्फ टूर्नामेंट में ‘हिस्सा लेने’ तक सीमित थी; जीतने की कोई महत्वाकांक्षा उनके भीतर नहीं थी।

बेदी ने अपनी दूरदर्शी रणनीति के तहत खिलाड़ियों की प्रतिभा को निखारने के साथ-साथ उनके भीतर आत्मविश्वास भरने का काम किया। इसका परिणाम जल्द ही दिखने लगा:

  • 2013-14 का ऐतिहासिक सत्र: बेदी के मार्गदर्शन में, जम्मू-कश्मीर ने पहली बार रणजी ट्रॉफी के क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया।

  • परवेज रसूल का उदय: जून 2014 में ऑलराउंडर परवेज़ रसूल भारत के लिए खेलने वाले पहले कश्मीरी क्रिकेटर बने। रसूल की कप्तानी में ही इस टीम ने कई बार की चैंपियन मुंबई को हराकर भारतीय घरेलू क्रिकेट में तहलका मचा दिया था।

पूर्व कप्तान परवेज़ रसूल ने हाल ही में एक साक्षात्कार में याद करते हुए कहा, “बेदी सर जम्मू-कश्मीर क्रिकेट में आए, और तभी हमारी मानसिकता पूरी तरह बदल गई। महान व्यक्ति ने हमसे कहा था: ‘बेटा, जाओ और मैदान पर प्रतिस्पर्धा करो, तुम्हारे पास कौशल की कोई कमी नहीं है।'”

हार के अंधेरों से जीत के उजाले तक का लंबा और कठिन संघर्ष

आज जो टीम फाइनल में है, उसका इतिहास बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। राष्ट्रीय स्तर की चैंपियनशिप में पदार्पण करने के बाद अपनी पहली जीत दर्ज करने के लिए उन्हें 23 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा था।

  • शुरुआती दौर की निराशा: 1959-60 में अपने पहले मैच में पूर्वी पंजाब के खिलाफ यह टीम क्रमशः 43 और 79 रन पर आउट होकर पारी के अंतर से बुरी तरह हार गई थी। अगले मैच में भी वे 100 रन का आंकड़ा नहीं छू सके।

  • पहली ऐतिहासिक जीत: 1982-83 के सीज़न में उन्होंने आखिरकार ‘सर्विसेज’ की टीम को चार विकेट से हराकर अपनी पहली रणजी जीत दर्ज की। यह इत्तेफाक ही है कि उसी साल उनके मौजूदा प्रतिद्वंद्वी कर्नाटक ने अपना तीसरा रणजी खिताब जीता था।

दबाव को पीछे छोड़ती नई पीढ़ी का साहसिक प्रदर्शन

अब, लगातार दूसरे वर्ष, किसी ऐसी टीम ने रणजी ट्रॉफी के फाइनल में जगह बनाई है जिसे पहले कमजोर (Underdog) माना जाता था। पिछले साल केरल ने यह कारनामा किया था, और इस बार जम्मू-कश्मीर क्रिकेट टीम ने असंभव को संभव कर दिखाया है।

अपने 15वें फाइनल में खेल रही रणजी इतिहास की दूसरी सबसे सफल टीम (कर्नाटक) के खिलाफ खेलते हुए भी जम्मू-कश्मीर के युवा खिलाड़ियों ने दबाव को खुद पर हावी नहीं होने दिया है।

  • शुभम पुंडीर और यावर हसन जैसे खिलाड़ियों ने शानदार शतक जड़कर अपनी दृढ़ता का प्रमाण दिया है।

  • अब्दुल समद जैसे युवा बल्लेबाजों ने अपनी क्लास और ग्रेस से सभी का दिल जीत लिया है और टीम को एक मजबूत आधार प्रदान किया है।

वर्तमान कोच अजय शर्मा और सफलता का श्रेय

जब कोई टीम अचानक सफलता के शिखर पर पहुंचती है, तो अक्सर इतिहास को भुला दिया जाता है। वर्तमान कोच अजय शर्मा ने टीम को मानसिक रूप से मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने चार साल पहले पहली बार कार्यभार संभाला था, तो उन्हें खिलाड़ियों की मानसिकता को समझने और बदलने में समय लगा। उन्होंने खिलाड़ियों के स्तर पर जाकर उन्हें मानसिक रूप से तैयार किया।

निःसंदेह, अजय शर्मा इस शानदार सफलता के लिए श्रेय के पात्र हैं, लेकिन इसका संपूर्ण श्रेय केवल मौजूदा समय को नहीं दिया जा सकता। इस सफलता की मजबूत नींव सालों पहले बिशन सिंह बेदी जैसे दिग्गजों द्वारा रखी गई थी।

क्रिकेट से परे: एक नए युग की शुरुआत

पिछले एक दशक में, पांच अलग-अलग टीमों ने रणजी ट्रॉफी जीती है, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारत में क्रिकेट प्रतिभा केवल कुछ बड़े राज्यों तक सीमित नहीं है।

यह महामुकाबला केवल क्रिकेट के मैदान तक सीमित नहीं है। एक ऐसे राज्य के लिए जिसने दशकों तक अशांति देखी है, जम्मू-कश्मीर क्रिकेट टीम की यह सफलता समाज में एक नई उम्मीद और सकारात्मक बदलाव ला सकती है। आज कर्नाटक के पक्के समर्थक भी शायद मन ही मन यह प्रार्थना कर रहे होंगे कि जम्मू-कश्मीर इस असंभव काम को पूरा करे और न केवल खेल का, बल्कि समाज के एक बड़े हिस्से का चेहरा बदल दे। बिशन सिंह बेदी ने इस गहरी बात को सालों पहले ही समझ लिया था।

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