राजस्थान

800 साल पुराना करमानघाट हनुमान मंदिर: जहाँ औरंगजेब की सेना भी हुई थी नतमस्तक

800 year old Karmanghat Hanuman Temple1

जानिए 800 साल पुराने इस आस्था केंद्र की विस्मयकारी गाथा हैदराबाद का वह हनुमान मंदिर, जिसे औरंगजेब भी नहीं छू सका, आज भी गूंजती है हनुमान जी की दहाड़, जानें इतिहास और रहस्य

हैदराबाद | स्थानीय ब्यूरो
अंतिम अपडेट: 23 फरवरी, 2026, 09:15 AM IST

आज के आधुनिक दौर में जहाँ हैदराबाद अपनी गगनचुंबी इमारतों और ‘हाइ-टेक’ जीवनशैली के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, वहीं इस शहर के हृदय स्थल चंपापेट में एक ऐसा आध्यात्मिक स्तंभ खड़ा है जो बीते 800 वर्षों के इतिहास और अटूट श्रद्धा का साक्षी है। हम बात कर रहे हैं ऐतिहासिक ‘करमानघाट हनुमान मंदिर’ की, जहाँ की शांत वादियाँ और दिव्य मूर्तियाँ भक्तों को एक अलग ही लोक का अनुभव कराती हैं।

काकतीय राजवंश और ऐतिहासिक विरासत

इस भव्य मंदिर का इतिहास 12वीं शताब्दी का है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इसका निर्माण काकतीय राजवंश के प्रतापी राजा प्रोल द्वितीय (King Prola II) द्वारा करवाया गया था। वास्तुकला की दृष्टि से यह मंदिर काकतीय शिल्प कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। आमतौर पर हनुमान जी को रौद्र, वीर या पराक्रमी मुद्रा में देखा जाता है, लेकिन करमानघाट में भगवान हनुमान अपनी विशिष्ट ‘ध्यान मुद्रा’ में विराजमान हैं। यहाँ उन्हें ‘अंजनेय स्वामी’ के रूप में पूजा जाता है, जिनकी शांत छवि ही भक्तों के अशांत मन को स्थिरता प्रदान करने के लिए पर्याप्त है।

“कर-मन-घाट”: जब मुगल आक्रांता के भी कांप उठे थे हाथ

मंदिर के नामकरण के पीछे एक अत्यंत रोमांचक और चमत्कारिक कथा प्रचलित है, जो मुगल काल से जुड़ी है। 17वीं शताब्दी में जब क्रूर मुगल बादशाह औरंगजेब अपनी विशाल सेना के साथ दक्षिण भारत के मंदिरों को नष्ट करता हुआ गोलकुंडा तक पहुँचा, तो उसकी दृष्टि इस मंदिर पर पड़ी।

Note: यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है।

स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, जब औरंगजेब की सेना ने मंदिर को ध्वस्त करने का प्रयास किया, तो वे मंदिर की चारदीवारी भी लांघ नहीं सके। कहा जाता है कि जैसे ही औरंगजेब स्वयं हथौड़ा लेकर मंदिर की देहरी पर पहुँचा, अचानक वहां एक बिजली की गड़गड़ाहट और भयंकर अट्टहास (दहाड़) गूंजी, जिससे मुगल सम्राट के हाथ कांपने लगे और वह बुरी तरह भयभीत हो गया।

उसी समय एक दिव्य आकाशवाणी हुई: “राजन, मंदिर तोड़ना है तो ‘कर मन घाट’।” अर्थात, “हे राजा, यदि तुम मंदिर को खंडित करना चाहते हो, तो पहले अपने मन को फौलाद जैसा कठोर बनाओ।” इस दैवीय हस्तक्षेप से विस्मित और भयभीत होकर औरंगजेब को अपनी सेना के साथ उल्टे पांव लौटना पड़ा। ‘कर मन घाट’ के इसी वाक्य से कालांतर में इस स्थान का नाम ‘करमानघाट’ पड़ा।

आस्था का केंद्र: मंडल अनुष्ठान और स्वास्थ्य लाभ

भक्तों के बीच करमानघाट हनुमान मंदिर की महत्ता केवल इसकी ऐतिहासिकता तक सीमित नहीं है। यहाँ होने वाला ‘मंडल अनुष्ठान’ श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र है। लोक मान्यता है कि यहाँ जो भी श्रद्धालु 40 दिनों का ‘मंडल अनुष्ठान’ पूर्ण भक्ति भाव से करता है, उसे असाध्य रोगों, विशेषकर मधुमेह (डायबिटीज) और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है। यद्यपि इन मान्यताओं का कोई औपचारिक वैज्ञानिक आधार नहीं है, परंतु भक्तों के स्वयं के अनुभव इसे एक दिव्य ऊर्जा केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं।

भक्तों का हुजूम और वर्तमान स्वरूप

हर सप्ताह मंगलवार और शनिवार को यहाँ भक्तों का जनसैलाब उमड़ता है। मंदिर प्रशासन और स्थानीय स्वयंसेवक भीड़ के प्रबंधन के लिए तत्पर रहते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि इस मंदिर की मिट्टी और हवा में एक सकारात्मक ऊर्जा व्याप्त है। आधुनिकता और विज्ञान की आपाधापी के बीच, करमानघाट हनुमान मंदिर आज भी अपनी विरासत और अध्यात्म को संजोए हुए लाखों लोगों के लिए आशा की एक नई किरण बना हुआ है।


अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में प्रस्तुत जानकारी धार्मिक मान्यताओं, ऐतिहासिक किंवदंतियों और ज्योतिषीय शास्त्रों पर आधारित है। मंदिर के चमत्कारों और स्वास्थ्य लाभों का विवरण आस्था से प्रेरित है। समाचार संस्थान व्यक्तिगत रूप से इन दावों की वैज्ञानिक प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।


साभार: स्थानीय संवाददाता, हैदराबाद (तेलंगाना)

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