📅 Tuesday, February 17, 2026 🌡️ Live Updates
धर्म

छठ पूजा 2025: प्रकृति, पवित्रता और प्रार्थना का अनूठा लोकपर्व छठ।

आस्था और भक्ति का अनूठा लोकपर्व ‘छठ’ उत्तर भारत, विशेषकर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाने वाला सूर्य उपासना का महापर्व है। यह त्योहार सूर्य, उनकी पत्नियों उषा और प्रत्युषा, प्रकृति, जल, वायु और सूर्य की बहन छठी मैया को समर्पित है। उषा और प्रत्युषा को सूर्य की शक्तियों का मुख्य स्रोत माना जाता है, इसीलिए छठ पर्व में सूर्य और छठी मैया के साथ इन दोनों शक्तियों की भी पूजा की जाती है। षष्ठी देवी को ही छठ मैया कहा गया है, जो नि:संतानों को संतान प्रदान करती हैं और बच्चों की रक्षा कर उन्हें लंबी उम्र देती हैं। पुराणों में पष्ठी देवी का एक नाम कात्यायनी है, जिनकी पूजा नवरात्रि के दौरान षष्ठी को की जाती है। मान्यता है कि छठ पर्व के दौरान सूर्य की आराधना करने से छठी माता प्रसन्न होती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि, रोग-मुक्ति, खुशहाली और मनोवांछित फल प्रदान करती हैं।

इस साल कार्तिक छठ पर्व 25 अक्टूबर से नहाय-खाय के साथ चार दिवसीय अनुष्ठान के साथ शुरू हो रहा है. इस दिन छठ व्रती नियम और धर्म के अनुसार सात्विक भोजन बनाएंगे और प्रसाद के रूप में ग्रहण करेंगे. छठ पूजा 2025 के लिए स्नान और भोजन के बाद ही छठी मैया का ध्यान करके संकल्प लेने की परंपरा है। इस दिन गीत गाकर छठी मैया और आदित्य देव का आह्वान करने की परंपरा है। 26 अक्टूबर को खरना है. इस दिन छठ व्रत करने वाले लोग प्रसाद के रूप में खीर बनाते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ छठी मैया को चढ़ाते हैं। लोहंडा का यह प्रसाद परिवार और आस-पड़ोस के लोगों द्वारा ग्रहण किया जाता है। मान्यता है कि खरना का प्रसाद ग्रहण करने से जीवन के सभी दुख दूर हो जाते हैं. छठी मैया व्रत करने वाले की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। 27 अक्टूबर को अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को सायंकालीन अर्घ्य दिया जायेगा. इस दिन छठ व्रती डूबते सूर्य को अर्ध्य देकर अपने परिवार की सुख-समृद्धि और संतान वृद्धि के लिए आदित्य देव से प्रार्थना करते हैं। मान्यता है कि डूबते सूर्य को जल चढ़ाने से भगवान दिनकर छठ व्रतियों को आशीर्वाद देते हैं. 28 अक्टूबर को उगते सूर्य को सुबह का अर्ध्य दिया जाना है. इस दिन छठ व्रती दीनानाथ के उगते स्वरूप का दर्शन कर सुख की कामना करते हैं। परिवार के सदस्य भी उनके सामने दूध और जल चढ़ाकर छठ व्रतियों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। छठी मैया से मंगल कामना की जाती है. छठ पूजा का प्रसाद छठ घाट पर ही ग्रहण करने का नियम है. अंतिम चरण में छठ व्रत किया जाता है और चार दिवसीय छठ पर्व का अनुष्ठान पूरा किया जाता है।

ये भी पढ़ें: छठ पूजा 2025: सूर्य उपासना का महापर्व छठ: लोक आस्था का अद्भुत संगम, मिलता है छठी मैया का आशीर्वाद

नियम, संयम और तपस्या का महापर्व छठ यूं तो चार दिनों तक चलता है लेकिन इसकी तैयारी कई हफ्ते पहले से ही शुरू हो जाती है। षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व की शुरुआत मूल रूप से बिहार और पूर्वाचल से मानी जाती है, लेकिन अब यह न केवल भारत के विभिन्न राज्यों में बल्कि विदेशों में भी मनाया जाने लगा है और न केवल बिहार और पूर्वाचल के बल्कि अन्य क्षेत्रों के भी कई लोग छठ पर्व के प्रति आस्थावान होकर इस व्रत को करने लगे हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य देव की बहन छठी मैया बच्चों की रक्षा करती हैं और उन्हें लंबी उम्र देती हैं। सुबह सूर्य की पहली किरण (उषा) और शाम को सूर्य की आखिरी किरण (प्रत्यूषा) दोनों को अर्ध्य देकर पूजा की जाती है। सूर्योपासना का महापर्व छठ कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है, इसीलिए इसे छठ कहा जाता है। यह चार दिवसीय त्योहार कार्तिक शुक्ल चतुर्थी के दिन ‘नहाय खाय’ के साथ शुरू होता है, अगले दिन ‘खरना’ किया जाता है, तीसरे दिन छठ का प्रसाद बनाया जाता है और स्नान करने के बाद डूबते सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है, चौथे और आखिरी दिन सप्तमी को उगते सूर्य की पूजा के साथ यह महापर्व समाप्त होता है। छठ पर्व के प्रसाद में अक्सर चावल के लड्डू बनाए जाते हैं और बांस की टोकरी में प्रसाद और फलों को सजाकर इस टोकरी की पूजा की जाती है। व्रत रखने वाली महिलाएं पूजा के लिए तालाब, नदी या घाट पर जाती हैं और डूबते सूर्य की पूजा करती हैं और अगले दिन सूर्योदय के समय सूर्य की पूजा करने के बाद प्रसाद बांटकर छठ पूजा समाप्त होती है। सही मायनों में यह महापर्व जीवनदाता सूर्यदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महापर्व है।

छठ महापर्व की शुरुआत को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं. मान्यता है कि लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्यदेव ने की थी। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को सभी ग्रहों का स्वामी माना जाता है। इसीलिए ऐसा माना जाता है कि यदि सभी ग्रहों को प्रसन्न करने के बजाय केवल सूर्य देव की ही पूजा की जाए तो कई लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि महाबली कर्ण ने सबसे पहले सूर्य देव की पूजा शुरू की थी और आज भी छठ पर्व के दौरान सूर्य को अर्ध्य देने का विशेष महत्व है। सूर्यपुत्र कर्ण भगवान सूर्य के बहुत बड़े भक्त थे, जो प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य देव को जल अर्पित करते थे। सूर्यदेव की कृपा से ही वह महान योद्धा बना। एक मान्यता यह भी है कि प्रथम देवासुर संग्राम में राक्षसों से देवताओं के पराजित होने के बाद देवी अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की पूजा की थी। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र को जन्म देने का वरदान दिया, जिसके बाद अदिति ने त्रिमूर्ति के रूप में भगवान आदित्य को जन्म दिया, जिन्होंने देवताओं को राक्षसों पर विजय दिलाई। कहा जाता है कि तभी से छठ पर्व मनाने का चलन शुरू हुआ.

इस पर्व को लेकर कुछ मान्यताएं महाभारत काल से भी जुड़ी हुई हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए थे, तब श्रीकृष्ण के कहे अनुसार द्रौपदी ने छठ व्रत रखा और छठी मैया के आशीर्वाद से उनकी मनोकामनाएं पूरी हुईं और पांडवों को उनका राज्य वापस मिल गया. पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा अपने परिवार के सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करने और लंबी उम्र के लिए नियमित रूप से सूर्य की पूजा करने का भी उल्लेख मिलता है। छठ पूजा के अवसर पर नदियों, तालाबों आदि के तटों पर पूजा की जाती है, जो लोगों को इन जल स्रोतों के आसपास स्वच्छता बनाए रखने के लिए प्रेरित करती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, छठ पूजा साफ नदियों, तालाबों या अन्य जल स्रोतों के किनारे की जाती है, इसीलिए पूजा से पहले इन जल स्रोतों के आसपास पूरी साफ-सफाई करने का नियम है। यह महापर्व नदियों को प्रदूषण से मुक्त करने की प्रेरणा देता है, इसीलिए इसे सबसे अधिक पर्यावरण अनुकूल हिंदू त्योहार माना जाता है।

-योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और 35 वर्षों से लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Link Copied!