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नीतीश कुमार का 75वां जन्मदिन: बिहार के ‘सुशासन बाबू’ की अविश्वसनीय और शानदार राजनीतिक यात्रा

नीतीश कुमार का 75वां जन्मदिन: बिहार के ‘सुशासन बाबू’ की अविश्वसनीय और शानदार राजनीतिक यात्रा

नीतीश कुमार का नाम भारतीय राजनीति, विशेषकर बिहार की सियासत में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। आज यानी 01 मार्च 2026 को बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल (यूनाइटेड) के सर्वमान्य नेता अपना 75वां जन्मदिन मना रहे हैं। राजनीति के इस धुरंधर खिलाड़ी ने बीते दशकों में न सिर्फ बिहार की दशा और दिशा को बदला है, बल्कि अपने अप्रत्याशित राजनीतिक दांव-पेच से राष्ट्रीय स्तर पर भी सभी को चौंकाया है।

हाल ही में, नवंबर 2025 में नीतीश कुमार ने 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड कायम किया है। उनके जन्मदिन के इस खास मौके पर, आइए उनके जीवन, संघर्ष और ‘सुशासन बाबू’ बनने तक की इस रोमांचक यात्रा पर एक विस्तृत नजर डालते हैं।

नीतीश कुमार का प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

राजनीति के इस माहिर रणनीतिकार का जन्म 01 मार्च 1951 को बिहार के बख्तियारपुर में हुआ था। उनके पिता, कविराज राम लखन सिंह, एक स्वतंत्रता सेनानी थे और आयुर्वेद के प्रख्यात वैद्य भी थे। देशभक्ति और समाज सेवा का यह जज्बा उन्हें विरासत में मिला था।

दिलचस्प बात यह है कि राजनीति के अखाड़े में उतरने से पहले वे एक प्रशिक्षित इंजीनियर थे। उन्होंने पटना के प्रतिष्ठित बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (अब NIT पटना) से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की थी। लेकिन, 1970-80 के दशक के उथल-पुथल भरे राजनीतिक माहौल ने उन्हें समाज सेवा और राजनीति की ओर मोड़ दिया।

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शुरुआती संघर्ष और राजनीति में नीतीश कुमार का प्रवेश (1970-1980)

1970 के दशक में जेपी आंदोलन (जयप्रकाश नारायण आंदोलन) से अपने सफर की शुरुआत करने वाले युवा नीतीश ने जनता दल के साथ काम करना शुरू किया। सफलता उन्हें रातों-रात नहीं मिली।

  • प्रारंभिक असफलताएं: 1977 और 1980 के विधानसभा चुनावों में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा।

  • पहली जीत: तमाम संघर्षों के बाद, साल 1985 में उन्होंने हरनौत विधानसभा सीट से अपनी पहली शानदार जीत दर्ज की, जिसने उनके सफल राजनीतिक करियर की नींव रखी।

नीतीश कुमार का उदय: समता पार्टी से जदयू (JDU) तक का सफर

भारतीय राजनीति में एक अलग पहचान बनाने की चाह में, साल 1994 में उन्होंने दिग्गज समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर ‘समता पार्टी’ का गठन किया। यह पार्टी उस वक्त बिहार में एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरी।

वक्त के साथ राजनीति के समीकरण बदले और साल 2003 में समता पार्टी का शरद यादव के जनता दल में विलय हो गया। इसी नई राजनीतिक इकाई को बाद में ‘जनता दल (यूनाइटेड)’ या जेडीयू (JDU) का नाम दिया गया। आज जेडीयू के पर्याय के रूप में सिर्फ एक ही नाम सामने आता है, और वह है नीतीश कुमार

मात्र 7 दिन की मुख्यमंत्री कुर्सी और नीतीश कुमार का संघर्ष (साल 2000)

03 मार्च 2000 का दिन उनके जीवन का एक बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ, जब वे पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। हालांकि, यह खुशी अल्पकालिक थी। बहुमत साबित न कर पाने के कारण महज 7 दिनों के भीतर उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन यह हार नहीं थी, बल्कि यह भविष्य के एक मजबूत और अजेय नेता के उदय की शुरुआत थी।

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सुशासन बाबू के रूप में नीतीश कुमार की मजबूत पहचान

साल 2005 का विधानसभा चुनाव बिहार के इतिहास में एक ‘टर्निंग पॉइंट’ था। एनडीए (NDA) के सहयोग से उन्होंने लालू प्रसाद यादव के 15 साल के लंबे शासनकाल को उखाड़ फेंका।

दूसरी बार सत्ता में आते ही उन्होंने कानून व्यवस्था, सड़क निर्माण और महिला सशक्तिकरण पर अपना ध्यान केंद्रित किया। जंगलराज के टैग को हटाकर बिहार में सुशासन और विकास की नई लहर लाने के कारण ही जनता ने उन्हें ‘सुशासन बाबू’ की उपाधि दी। इसके बाद साल 2010 में उन्होंने और भी बड़े बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की।

गठबंधनों के मास्टरमाइंड: नीतीश कुमार का राजनीतिक लचीलापन

राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने और सत्ता के शीर्ष पर बने रहने की उनकी क्षमता अद्वितीय है। उनका राजनीतिक लचीलापन अक्सर चर्चा का विषय रहा है:

  • 2013: प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नरेंद्र मोदी के नाम का विरोध करते हुए एनडीए से नाता तोड़ा।

  • 2015: अपने धुर विरोधी लालू प्रसाद यादव की राजद (RJD) और कांग्रेस के साथ ‘महागठबंधन’ बनाया और बंपर जीत हासिल की।

  • 2017: भ्रष्टाचार के मुद्दे पर महागठबंधन से नाता तोड़कर फिर से एनडीए में वापसी की।

  • 2022: एक बार फिर एनडीए का साथ छोड़कर महागठबंधन के साथ सरकार बनाई।

  • 2024: लोकसभा चुनाव से ठीक पहले फिर से एनडीए का दामन थामा और केंद्र में अहम भूमिका निभाई।

लगातार गठबंधन बदलने के बावजूद, राज्य के मुख्यमंत्री पद पर उनकी पकड़ कभी कमजोर नहीं हुई। यह उनकी जबरदस्त राजनीतिक समझ और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता का ही उदाहरण है।


नवंबर 2025 में 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना यह साबित करता है कि बिहार की राजनीति उनके इर्द-गिर्द ही घूमती है। अपने 75वें जन्मदिन पर, वे न केवल एक अनुभवी राजनेता के रूप में खड़े हैं, बल्कि बिहार के विकास की धुरी भी माने जाते हैं।

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